शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

पृथ्वी न्यूज़ पेपर ( हास्य रचना )



हास्य रचना ------

(प्रस्तुत हास्य रचना कल्पना पर आधारित हास्य मात्र है। पृथ्वी से एक समाचार पत्र प्रकाशित होता है, जिसके संवाददाता सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मे फ़ैले हुए हैं। जो कि अपने समाचार इस पृथ्वी न्यूज़ पेपर को भेजते है। प्रस्तुत है स्वर्ग से आए संवाददाता की रिपोर्ट) 

पृथ्वी न्यूज़ पेपर


                    आज स्वर्ग के संवाददाता स्वर्ग का भ्रमण कर वहाँ के समाचारों के साथ वापस धरती पर आ गये। संवाददाता ने बताया कि काफ़ी समय पूर्व ब्रह्मा जी ने पतियों के अनुकूल चलने वाली " पत्नी निर्माण" कारखाने को बन्द कर दिया है, तथा अब वहाँ पति के अनुकूल चलने वाली पत्नियों का "पुराना स्टाक" भी समाप्त हो गया है। इस तरह से अब ये तय हो गया है कि पति जो कहीं-कहीं "भेड़" के रूप में दिखता था अब कुछ ही समय में हर स्थान पर सुलभ होगा। "कर्कशा-पत्नियाँ" हर गली-कूचे-घर-कमरे-झोपड़ी में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होंगी, जो कि अपने-अपने "भेड़-पति" को अपने आदेशानुसार संचालित कर रही होंगीं।

                    वहीं विश्वस्त सूत्रों से हमारे संवाददाता को यह भी पता चला है कि भविष्य में होने वाले इस खतरे रूपी परिवर्तन पर पतियों और पति बनने की राह देख रहे "भावी पतियों" में खलबली मच गई है और उन्होने ऐसी स्थिति से निपटने के लिये इस पर कड़ी निगाह रखनी शुरू कर दी है, परन्तु "पत्नी-भय" के कारण संगठित नहीं हो पा रहे हैं।

                    हमारे संवाददाता ने कई "पत्नी-भय से क्लान्त पतियों" से बात करने की कोशिश की, ये भयभीत पति बात भी करना चाहते थे परन्तु अपनी पत्नियों की छवि को अपनी आँखों से दूर न कर पाने के कारण कुछ भी बात करने में असमर्थ रहे।

                    पृथ्वी पर संचालित सरकारें भी भविष्य में आने वाले इस "कर्कशा-पत्नी-भूचाल" से घबरा गईं हैं और इनसे निपटने की कार्ययोजना बना रही हैं, परन्तु इन्हे भी कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है।

               अब सब कुछ ब्रह्मा जी पर निर्भर है कि वे जल्द से जल्द "पतिनुकूल पत्नियों" का उत्पादन शुरू करें और पृथ्वी समेत सम्पूर्ण सृष्टि को इस भयावह स्थिति से निजात दिलायें।

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-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

( इस हास्य का मकसद किसी को किसी भी प्रकार का कष्ट देना नहीं है, फ़िर भी प्रस्तुत हास्य से किसी को भी किसी भी प्रकार का कष्ट पहुँचा हो तो मैं लेखक के रूप मे क्षमा प्रार्थी हूँ - गोपाल कृष्ण शुक्ल)

शनिवार, 28 मार्च 2015

शब्दाघात

                         शब्द ब्रह्म है और शब्द ही आघात भी। ब्रह्म जहाँ मन को शान्ति प्रदान करता है वहीं आघात मन और शरीर दोनो को कष्ट देता है, क्षति पहुँचाता है। तलवार जो कि शरीर पर चोट करती है, घाव भी देती है, उसकी चोट से, उसके घाव से और उसकी पीड़ा से चिकित्सा द्वारा आराम मिल जाता है, परन्तु शब्द द्वारा किये गये आघात से पैदा हुए घाव को, पीड़ा को किस चिकित्सा से, किस औषधि से ठीक करें, यह पहचान करना मुश्किल होता है।

                         यह सब जानते हुए भी हम अपने शब्दों/वाक्यो से, लोगों को, अपने करीबियों को, अपने हितैषियों को अपने प्रति समर्पण का भाव रखने वालों को आघात पहुँचाते रहते हैं। हम यह भी नहीं सोचते कि जिसके प्रति हमने ऐसे शब्द प्रयोग किये जिससे उसे आघात पहुँचा उसकी मनःस्थिति कैसी हो रही होगी, उसको कितनी आन्तरिक पीड़ा हो रही होगी। हमें अपने मुख से बोलने के पहले अपने द्वारा कहे जा रहे शब्द/वाक्य पर विचार कर लेना चाहिये जिससे उस शब्द/वाक्य को सुनने पढ़ने वाला व्यथित न हो। हमें हमेशा यह ध्यान रखना चाहिये कि मुख से निकले हुए शब्द/वाक्य को वापस नहीं लिया जासकता। वह शब्द/वाक्य अपनी प्रकृति के अनुसार प्रेम का प्रदर्शन या शब्दाघात तो करेगा ही।

                         जाने-अनजाने हमने भी कई बार ऐसा आघात किया होगा, जिससे लोगों को कष्ट पहुँचा होगा, लोग व्यथित हुए होगें। 

                         सभ्य पुरुष वही है जो अपने ऐसे जाने-अनजाने अपराध को स्वीकार करे और भविष्य मे ऐसे हृदय-आघातिक अपराध न करे। यदि हम अभी भी चेत जायें तो ऐसे अपराध से बच सकते है।


---- इति

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

दुखी मन

                         मानव के दुखों का कारण मन की वृत्तियों पर व्यक्ति के नियन्त्रण का अभाव है। यह अभाव इस कारण है कि व्यक्ति के पास मन तो है पर "मनन" नहीं।

                         अगर मन व्यक्ति का दास हो जाये तो सजग व्यक्ति अच्छा-बुरा पहचान कर मन को अच्छाई मे लगा कर बुराई को रोक सकता है। तब उस व्यक्ति के पास शान्ति ही शान्ति रहेगी।

                         आज के भौतिकतावादी समाज में आगे बढने की होड में मनुष्य मन को ही अपना विवेक, ग्यान, समझदारी आदि सौंप कर स्वयं उसका गुलाम बना बैठा है। जब कि मन उसका है, उसे स्वामी बन कर मन को अपनी कुशलता एवं आवश्यकतानुसार चलाना चाहिये।

                         मन का सकारात्मक दिशा में प्रयोग जहाँ एक ओर परम सत्य का अनुरागी बना देता है वहीं दूसरी ओर मन का नकारात्मक प्रयोग क्लेश, दुख और अशान्ति के द्वार खोल देता है।

                         वर्तमान समय में मानव के दुख, रुदन, अवसाद आदि का मूल कारण मन की विभ्रान्त स्थिति ही है, जो मन को भटकाये रहती है। भटकते रहने वाला मन कभी भी संसार के वास्तविक स्वरूप का आंकलन नही करने देता। इस संसार के स्वरूप के सत्य ग्यान का अभाव मानव अस्तित्व को ही संकट मे डाले रहता है। इस कारण ग्यान-चक्षुओं को बन्द किये हुए मानव पैसे को ही सब-कुछ मानकर  स्वयं पैसा बन कर रह गया है।

                         मन बहुत चंचल है। इतना चंचल कि कोई अगर चाहे कि पकड कर इसे रोक ले तो यह असंभव है। जितना इसे रोकना चाहेंगें उतना ही तेजी से ये भागेगा। मन की यह तेजी बताती है कि इसमे अपार शक्ति है। यह क्षण भर में संसार के पार दूसरे लोक में पहुँच सकता है तथा पल भर में ही फ़िर अपनी पसन्द की क्रीडा में लग सकता है। 

                         यदि हम चाहें तो अपने दृढ संकल्प के बल पर मन को युक्तिपूर्वक एक स्थान पर रोक कर अनन्त शक्ति के धनी बन सकते हैं। यह कार्य कठिन नही, सिर्फ़ सार्थक प्रयास की आवश्यकता है।


गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

धर्म के लक्षण

धर्म के लक्षण
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धारणाद धर्ममित्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः

धर्म सभी प्राणियों का धारण-पोषण करता है, इसलिये महर्षियों ने उसे धर्म कहा है।

वेद, स्मृति, सदाचार और आत्मतुष्टि अर्थात अपनी आत्मा को प्रिय लगने वाला - ये धर्म के साक्षात लक्षण हैं।

हिंसा न करना, सच बोलना, चोरी न करना, पवित्र रहना और इन्द्रियों को संयम मे रखना - महर्षियों ने संक्षेप मे इसी को धर्म बताया है।

धर्म के दस लक्षण
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धृति, क्षमा, दम, चोरी न करना, मन, वाणी और शरीर की पवित्रता, इन्द्रियों का संयम, सुबुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना।

क्रूरता न करना (दया), क्षमा, सत्य, अहिंसा, दान, नम्रता, प्रीति, प्रसन्नता, कोमल वाणी और कोमलता - ये दस यम हैं।

पवित्रता, यग्य, तप, दान, स्वाध्याय, ब्रह्मचर्य, व्रत, मौन, उपवास और स्नान - ये दस नियम हैं।

दया करो किसी को मत मारो पराया हो या अपना, भाई-बन्धु या मित्र हो, शत्रु हो या बैरी - जो विपत्तियों में पडा हो, उसे दुख में देखकर उसकी रक्षा करने का नाम है, दया - करुणा।

जो आदमी माँस खाता है वही घातक नहीं है, आठ व्यक्ति घातक है - १- माँस के लिये सम्म्ति देनेवाला, २- काटने वाला, ३- मारने वाला, ४- खरीदने वाला, ५- बेचने वाला, ६- लाने वाला, ७- पकाने वाला, ८- खाने वाला।

पंच महायग्य
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गृहस्थ के आवास में हिंसा के ये पाँच स्थान हैं - चूल्हा, चक्की, झाडू, ओखली और पानी के घडे। इनसे वह पाप में बँधता है। गृहस्थों को इन दोषों से मुक्त करने के लिये महर्षियों ने प्रतिदिन पंच महायग्य करने को निर्देशित किया है।

ये पाँच महायग्य हैं - १- पढाना-(ब्रह्मयग्य), २- तर्पण-(पितृयग्य), ३- हवन-(देवयग्य),  ४- बलिवैश्यदेव*- (भूतयग्य), ५- अतिथ-सत्कार-(मनुष्य यग्य)
*बलिवैश्यदेव यग्य मे कुत्ता, पतित, चाँडाल, पाप रोगी, कौआ और कृमि इन छै के लिये भोजन मे से छै भाग निकाले।

प्रणाम करने का जिसे स्वभाव है और जो रोज गुरुजनो की सेवा करता है, उसकी आयु और विद्या, यश और बल, बढते हैं।

जो कार्य माता-पिता और गुरू को प्रिय लगे वही कार्य करना चाहिये। इन तीनों के संतुष्ट होने से सारे तप पूरे हो जाते हैं।

बुधवार, 7 नवंबर 2012

विश्वास का आधार क्या हो ?

"विश्वास का आधार क्या हो ? रूप, रँग, गुण, धर्म, जाति, कुल या शब्द या फ़िर कुछ भी नही। या फ़िर विश्वास किया ही नही जाना चाहिये। अथवा विश्वास सिर्फ़ एक स्वप्न के समान है..? अगर विश्वास न होगा तो फ़िर जीवन को गति कैसे मिलेगी? जिन्हे हम अपना मानते हैं, वो जब हमारे या अपने शब्दों से विमुख हो जाता है तब हम स्तब्ध रह जाते हैं और तब शुरू होता है इस बात का आंकलन कि हमसे भूल कहाँ हुई। तभी विश्वास की नाजुक डोर टूटने लगती है। तब प्रश्न उठता है कि विश्वास का आधार क्या हो............"

स्वप्न और विश्वास में क्या सामंजस्य...? स्वप्न बनते ही हैं टूटने, बिखरने के लिये। स्वप्न हम खुली या बन्द आँखों से अपने मन की धारणाओं के अनुसार गढ लेते है, पर विश्वास की महत्ता अलग है। विश्वास धीरे-धीरे पनपता है और दृढ होता है।

हम सब अपनी धारणाओं की स्वीकृति चाहते हैं, जो हमारी धारणाओं को समर्थन देते हैं, हम उन पर विश्वास करते हैं। पर जब कभी कोई हमारी धारणाओं को मानने वाला हमसे विपरीत हो जाता है तब हम व्यथित हो जाते हैं, हमारे विश्वास को ठेस लगती है और धीरे-धीरे उस व्यक्ति पर से हमारा विश्वास टूट जाता है। तात्पर्य यह है कि हम अपनी धारणायें मनवाने के लिये उतावले रहते हैं और इसी की वजह से परेशान भी।

हम यदि पहले ही व्यक्ति के गाँभीर्य को परख लें तब उसके द्वारा कहे गये शब्द अर्थवान/अर्थहीन हो जाते हैं। तब हमे क्लेश नही होता किसी अपने के द्वारा कहे गये शब्दों से विमुख होने का। यह हम पर निर्भर है कि हम उसको कितना परख पाते हैं। व्यक्ति को परखना हमारे अपने अनुभव पर आधारित है।

विश्वास की डोर नाजुक नही होती। अगर विश्वास की डोर नाजुक है तो वह विश्वास की श्रेणी में आ ही नही सकता। विश्वास तो दृढता से किया जाता है। मन के डावाँडोल होने से अगर विश्वास को ठोकर लगती है तो यह हमारे मन का दोष है न कि विश्वास का।

विश्वास अखण्ड संरचना है। यह टूट नही सकता। यह जरूर है कि विश्वास कभी-कभी गलत हो सकता है। पर गलत विश्वास नही बल्कि जिस व्यक्ति पर विश्वास होता है वह गलत होता है। विश्वास ही जीवन का आधार है। सुखमय संसरण का मूल है। जो विश्वास को नही जानता या नही मानता उसका जीवन धरातल विहीन है, व्यर्थ है। "भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वास रुपिणौ"---- गोस्वामी तुलसीदास की इस पँक्ति का यही है निहितार्थ।


सोमवार, 22 अक्तूबर 2012

हिन्दू धर्म की पांच प्रमुख सती नारियाँ

स्त्री का पतिव्रता होना स्त्री का प्रमुख गुण है। एक ही पति या पत्नी धर्म का पालन करना हिन्दू धर्म के कर्तव्यों मे शामिल है। भारत में अनगिनत ऐसी महिलायें हुईं हैं जिनकी पतिव्रता पालन की मिसाल दी जाती है। उनमे से कुछ ऐसी हैं जो इतिहास का अमिट हिस्सा बन चुकी हैं।

हिन्दू इतिहास के अनुसार इस संसार मे पाँच सती स्त्रियाँ हुईं, जो क्रमशः इस प्रकार हैं -

१- अनसुइया
२- द्रौपदी
३- सुलक्षणा
४- सावित्री
५- मंदोदरी

१- अनसुइया - पतिव्रता देवियों में अनसुइया का स्थान सबसे ऊँचा है। वे ऋषि अत्रि की पत्नी थी। एक बार त्रिदेव माता अनसुइया की परीक्षा लेने ऋषि अत्रि के आश्रम में भिक्षा मांगने गये और अनसुइया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगीं तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगें। तब माता अनसुइया ने अपने सतीत्व के बल पर तीनों देवों को अबोध बालक बना कर उन्हे भिक्षा दी। यह भी कहा जाता है कि माता अनुसुइया ने श्री राम के वनवास काल मे चित्रकूट प्रवास के समय माता सीता को पतिव्रत धर्म का उपदेश दिया था।

२- द्रौपदी - पाँच पाँडवों की पत्नी द्रौपदी को पाँच कुंवारी कन्याओं में भी गिना जाता है। द्रौपदी के पिता पाँचाल नरेश द्रुपद थे। द्रौपदी के स्वयंवर मे अर्जुन ने अपने वनवास काल में द्रौपदी को वरण किया। अर्जुन अपने अन्य भ्राताओं के साथ द्रौपदी को लेकर माता कुंती के पास अपनी कुटिया में पहुंचे तथा द्वार से ही पुकार कर अर्जुन ने अपनी माता कुंती से कहा, "माते ! आज हम लोग आपके लिये अदभुत भिक्षा ले कर आये हैं।" इस पर कुंती ने भीतर से ही कहा, "पुत्रों ! तुम लोग आपस में मिल-बाँट कर उसका उपभोग कर लो।" बाद में ग्यात होने पर कि भिक्षा वधू के रूप में है, कुंती को बहुत दुख हुआ। किन्तु माता के वचन को सत्य सिद्ध करने के लिये द्रौपदी ने पाँचों पाँडवों को पति के रूप में स्वीकार कर लिया।

३- सुलक्षणा - लंकाधिपति रावण के पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) की पत्नी सुलक्षणा को भी पाँच सती नारियों मे स्थान दिया गया है।

४- सावित्री - महाभारत के अनुसार सावित्री राजर्षि अश्वपति की पुत्री थीं। उनके पति का नाम सत्यवान था। सावित्री के पति सत्यवान की असमय मृत्यु के बाद सावित्री ने अपनी तपस्या के बल पर सत्यवान को यमराज के  हाथों से वापस ले लिया था। सावित्री के नाम से ही वट सावित्री नामक व्रत प्रचलित है।

५ - मंदोदरी - मंदोदरी लंकाधिपति रावण की पत्नी थीं। हेमा नामक अप्सरा मंदोदरी की माता थी तथा मयासुर मंदोदरी के पिता थे। मंदोदरी लंकाधिपति रावण को हमेशा अच्छी सलाह देती थीं। यह भी कहा जाता है कि अपने पति रावण के मनोरंजन हेतु मंदोदरी ने ही शतरंज नामक खेल का आविष्कार किया था।


सोमवार, 15 अक्तूबर 2012

कानपुर मे सिनेमा

                            ब्रिटिश शासन मे उत्तर भारत में औद्योगिक शुरुआत के साथ सिनेमा की शुरुआत कानपुर से ही हुई। सबसे पहले अंग्रेजों ने स्वयं के लिये कुछ सिनेमाघरों को बनवाया जो कि बाद मे भारतीयों द्वारा खरीद लिये गये। "एस्टर टाकीज" और "प्लाजा टाकीज" अंग्रेजों द्वारा बनाई गई थी जिसे बाद मे भारतीयों ने खरीद लिया, जो कि क्रमशः "मिनर्वा सिनेमा" और "सुन्दर टाकीज" के नाम से मशहूर हुईं।
                       
                        कानपुर मे पहला सिनेमाघर "बैकुँठ टाकीज" के नाम से खुला। जिसकी स्थापना कलकत्ता की एक कम्पनी चरवरिया टाकीज प्रा.लि. ने सन 1929 में की। इस टाकीज को सन 1930 में पंचम सिंह नाम के व्यक्ति ने खरीद लिया और टाकीज का नाम बदल कर "कैपिटल टाकीज" कर दिया। इस सिनेमाघर की पूरी छत टिन की बनी थी, जिस वजह से स्थानीय लोग इसे "भडभडिया टाकीज" भी कहते थे।

                        सन 1930-40 का युग कानपुर सिनेमा का स्वर्णिम युग कहा जाता है। कानपुर में सन 1936 "मँजूश्री टाकीज" (घन्टाघर के पास) का निर्माण हुआ, जिसे प्रसाद बजाज ने बनवाया। सन 1937 मे "शीशमहल टाकीज" (पी.रोड) का निर्माण हुआ। सन 1946 में "जयहिंद सिनेमा" (गुमटी नं. पाँच) बना। सन 1946 में ही जवाहर लाल जैन ने "न्यू बसंत टाकीज" और लाला कामता प्रसाद ने "शालिमार टाकीज" का निर्माण कराया। "शालिमार टाकीज" का नाम बाद मे "डिलाइट सिनेमा" हो गया। सन 1940 में "इम्पीरियल टाकीज" (पी.पी.एन. मार्केट के सामने) का निर्माण हुआ। आगे चलकर सूरज नारायण गुप्ता ने "नारायण टाकीज" (बेगम गंज) का निर्माण कराया।

                        70-80  के दशक मे कई सिनेमाघर खुले, जैसे "हीरपैलेस" (माल रोड), "अनुपम टाकीज" (जूही), "सत्यम टाकीज" (माल रोड), "संगीत टाकीज", "सुन्दर टाकीज" (माल रोड), "गुरुदेव टाकीज", "पम्मी थियेटर" आदि।

                        दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत मे सिनेमाघरों मे छपा टिकट या पास नही चलता था। तब दर्शकों को अपने हाथ मे "मोहर" लगवा कर सिनेमा घर के अन्दर प्रवेश मिलता था।

                        आज तो कानपुर महानगर मे कई मल्टीफ़्ल्र्केज खुल गये है। जैसे “रेव थ्री”, "रेव मोती”, “ज़ेड एस्क्वायर” आदि। परन्तु जो आनन्द का अनुभव सिनेमाघरों मे था वो आनन्द इन मल्टीफ़्लेकसेज मे नही है।

                         यह कानपुर मे सिनेमा का संक्षिप्त "स्वर्णिम इतिहास" है।

रविवार, 14 अक्तूबर 2012

स्वामी विवेकानन्द






"अपनी ओजस्वी वाणी से विश्व में भारतीय सँस्कृति व अध्यात्म का शंखनाद करने वाले स्वामी विवेकानन्द एक आदर्श एवं आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे। युवाओं के लिये विवेकानन्द साक्षात भगवान के समान थे।स्वामी विवेकानन्द की दी हुई शिक्षा पर जो भी व्यक्ति चलेगा उसे सफ़लता अवश्य मिलेगी। अपनी वाणी और तेज से स्वामी विवेकानन्द ने सारी दुनिया कि आश्चर्यचकित कर दिया था।"

स्वामी विवेकानद का मूल नाम नरेन्द्र नाथ था। उनका जन्म १२ जनवरी १८६३ को कलकत्ता में हुआ था। बाल्यावस्था में ही स्वामी विवेकानन्द जी के व्यवहार में आध्यात्म स्पष्ट झलकता था। स्वामी विवेकानन्द वृति से श्रद्धालु एवं दयालु थे, वे बचपन से ही कोई भी कार्य साहस और निडरता से करते थे। स्वामी विवेकानन्द का पूरा परिवार धार्मिक था, इसी कारण बाल्यावस्था से ही उनमे धार्मिक संस्कार आते गये। सन १८७० मे पठन-पाठन हेतु ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की पाठशाला मे उन्हे भेजा गया। स्वामी विवेकानन्द ने मैट्रिक की परिक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। आगे चल कर कलकत्ता प्रेसीडेन्सी महाविद्यालय से उन्होने "तत्वग्यान" विषय में एम.ए. किया।

स्वामी विवेकानन्द के घर मे पले-बढे उनके एक सम्बन्धी डा. रामचन्द्र दत्त स्वामी रामकृष्ण जी के बहुत भक्त थे। धर्म के प्रति लगाव होने से स्वामी विवेकानन्द के मन में बचपन से ही वैराग्य उत्पन्न हुआ देख डा. दत्त एक बार उनसे बोले - "भाई, धर्म-लाभ ही तुम्हारे जीवन का उद्येश्य है तो तुम ब्राह्मसमाज इत्यादि के झंझट में मत पडो। तुम दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण जी के पस जाओ। डा. दत्त के बतायेनुसार स्वामी विवेकानन्द वहाँ गये और उन्हे वह सब कुछ प्राप्त हुआ जो उनको चाहिये था... ये थी गुरु कृपा। जो उन्हे समय-समय पर स्वप्न आदि के माध्यम से प्राप्त होती रहती थी। इसी तरह का एक प्रसंग.....

"एक दिन रात्रि में अर्धजागृत अवस्था में स्वामी विवेकानन्द को एक अद्भुत स्वप्न दिखाई दिया, उन्होने देखा कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस ज्योतिर्मय देह धारण कर समुद्र से आगे-आगे बढे जा रहे हैं तथा वे मुझे पीछे-पीछे आने के लिये संकेत कर रहे हैं। क्षण भर में विवेकानन्द जी के नेत्र खुल गये। उनका हृदय अवर्णनीय आनन्द से भर उठा। उसके साथ ही "जा’... "जा"... ऐसी देववाणी सुनाई दी। विदेश जाने हेतु सारे संशय समाप्त हो गये। प्रस्थान करने का संकल्प दृढ हो गया। एक-दो दिन में यात्रा की तैयारी पूर्ण हो गई।"

सोमवार ११ सितम्बर १८९३ को प्रातः अनेक धर्मगुरुओं के मंत्रोच्चार के उपरांत संगीतमय वातावरण में धर्मपरिषद का शुभारंभ हुआ। मंच के मध्य भाग में अमेरिका के रोमन कैथोलिक पंथ के धर्मप्रमुख थे। स्वामी विवेकानन्द किसी एक विशिष्ट पंथ के प्रतिनिधि नहीं थे। वे भारत के "सनातन हिन्दू वैदिक धर्म" के प्रतिनिधि के रूप में इस परिषद में आये थे। इस परिषद में छै-सात हजार श्रोता उपस्थित थे। परिषद के मंच से प्रत्येक वक्ता अपना लिखित वक्तव्य पढ कर सुना रहे थे। जब परिषद के अध्यक्ष ने स्वामी जी को बोलने के लिये आमंत्रित किया तब विवेकानन्द जी स्वामी रामकृष्ण परमहंस का स्मरण कर अपनी जगह से उठे और अपना व्याख्यान "अमेरिका की मेरी बहनों और बन्धुओं" कह कर शुरू किया। उनकी चैतन्यपूर्ण तथा ओजस्वी वाणी से सभा मे उपस्थित सभी वक्ता एवं श्रोता मंत्रमुग्ध हो गये। इन शब्दों में ऐसी अद्भुत शक्ति थी कि श्रोता अपने स्थान पर खडे हो कर करतल ध्वनि करने लगे। श्रोताऒ की हर्षध्वनि और करतल ध्वनि रुक नही रही थी। स्वामी जी के उन भावपूर्ण शब्दों के अपनत्व से सभी श्रोताओं के हृदय स्पंदित हो गये। "बहनों और बंधुओं" से मानव जाति का आह्वाहन करने वाले स्वामी विवेकानन्द एकमात्र वक्ता थे।

इस परिषद में भारत के विषय में बोलते हुए स्वामी जी ने कहा, "भारत पुण्य भूमि है, कर्म भूमि है, ग्यान भूमि है। यह एक सनातन सत्य है कि भारत अंतर्दृष्टि तथा आध्यात्मिकता का जन्म स्थान है।"

धर्मप्रवर्तक, तत्वचिंतक, विचारवान एवं वेदांतमार्गी राष्ट्रसंत आदि अनेक रूप मे विवेकानन्द का नाम विख्यात है। तरुणावस्था में ही सन्यास की दीक्षा लेकर हिन्दू धर्म के प्रचारक-प्रसारक बने। स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती "अन्तर्राष्ट्रीय युवा दिवस" के रूप में मनाई जाती है।

युवको के लिये उनका कहना था कि पहले अपने शरीर को हृष्ट-पुष्ट करो, मैदान में जाकर खेलो, कसरत करो, जिससे स्वस्थ-पुष्ट शरीर से धर्म-अध्यात्म ग्रंथों मे आदर्शॊं मे आचरण कर सको।

१९०२ में मात्र ३९ वर्ष की अवस्था में ही स्वामी विवेकानन्द महासमाधि मे लीन हो गये। उनके कहे गये शब्द आज भी सम्पूर्ण विश्व के लिये, मानवता के लिये प्रेरणादायी हैं।

स्वामी विवेकानन्द जी की उत्साही, ओजस्वी एवं ऊर्जा से परिपूर्ण वेद की उक्ति " उतिष्ठ.... जाग्रत... प्राप्य वरान्निबोधित" ( उठो..... जागो..... और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के पूर्व मत रुको) जन-जन को प्रेरणा देते रहेंगे।


वन्दे मातरम.................................

भारत माता की जय.......................



रविवार, 30 सितंबर 2012

भ्रम के साम्राज्य में अँधेरा ही अँधेरा और ....... तन्हाई


आशा गुप्ता ’आशु’ जी से फ़ेसबुक पर हुई वार्ता.................



आशा गुप्ता ’आशु’ - भ्रम के साम्राज्य में अँधेरा ही अँधेरा
                               और......... तन्हाई

Gopal Krishna Shukla - और......... तन्हाई....
                                     भ्रम का मायाजाल

आशा गुप्ता "आशु" - मायावी दुनिया में
                                अस्तित्व का अभाव.......

Gopal Krishna Shukla - और साथ ही स्थिरता शून्य.....

आशा गुप्ता "आशु" - शून्य में तलाशते स्वयं को हम.....

Gopal Krishna Shukla - और "हम" से प्राप्त करते "अहम"......... फ़िर उसी में डूबते चले जाते हैं.....  साकार करने मायावी लोक को......

आशा गुप्ता "आशु" - क्या हासिल....... रिक्तता के सिवाय

Gopal Krishna Shukla - रिक्तता या शून्य ही तो जीवन है

आशा गुप्ता "आशु" - ये जीवन है या अभावों की संवेदना....

Gopal Krishna Shukla - जीवन मिला ही है वेदना की अनुभूति करने के लिये

आशा गुप्ता "आशु" - और इसकी पराकाष्ठा......... अंतर्मन में घुलता विष

Gopal Krishna Shukla - पराकाष्ठा अपने मष्तिष्क की देन है... चाहे तो अंतर्मन में विष भर कर जियें, चाहे वेदना को सहकर परमपिता को जीवन समर्पित कर मोक्ष प्राप्त कर लें..

आशा गुप्ता "आशु" - अनुभूतियों के शिखर से ढुलकते हुए सब कुछ तितर-बितर होने लगता है ऐसे में परमपिता भी कहाँ साथ होते है.. कोई हाथ आगे नही बढाता संभालने के लिये

Gopal Krishna Shukla - अनुभूतियों के शिखर से ढुलकते हुए तभी सब कुछ तितर-बितर होने लगता है, जब हम अपने मष्तिष्क से अपना नियंत्रण खो देते हैं... अपने हृदय को मायावी दुनिया से लगा लेते हैं... ऐसी स्थिति में हम खुद ही अपने साथ नही रहते........ जब तक हम खुद अपने साथ नही रहेंगें तब तक परम शक्ति को कैसे पा सकते है

आशा गुप्ता "आशु" - स्वयं का स्वयं के प्रति व्यवहार जब दुरूह होने लगता है तभी तो ये सारी स्थितियाँ पैदा होती है... अवसाद का वर्चस्व.. कुंठा को ही जन्म देती है ना

Gopal Krishna Shukla - "स्वयं" में जब "स्व" की अधिकता होगी... तभी दुरूह स्थितियाँ और कुंठा जन्म लेगी

आशा गुप्ता "आशु" - कुंठित हृदय.... सुख का अभिलाषी... बस अंतहीन पीडा

Gopal Krishna Shukla - यह "स्व" जन्य परिस्थितियाँ हैं

आशा गुप्ता "आशु" - हाँ..... और कभी-कभी इसके सिवा कोई और उपाय भी नही होता

Gopal Krishna Shukla - उपाय है..... मन को विजित करना

आशा गुप्ता "आशु" - बहुत कठिन है डगर पनघट की......

Gopal Krishna Shukla - "पनघट" की डगर से हट कर यदि "मरघट" की डगर पर ध्यान केंद्रित करें...... तो सब आसान है

आशा गुप्ता "आशु" - हहहहहहहा........ इस लोक में सुख भोग चुके अब आगे की सुधि ली जाये..

Gopal Krishna Shukla -  सच यही है कि.... सुख अगले लोक में ही है...


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शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

माँ गंगा अजेय हैं-------

          सन 1953  दिनांक 29 मई को एवरेस्ट पर अपना पहला कदम रखने वाले एडमंड हिलेरी ने इतिहास रचा। अपार जीवट वाले हिलेरी ने उसके बाद भी हिमालय की दस और चोटियों की चढाई की। हिलेरी उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर भी गये तथा विजय हासिल की।

          लेकिन यह तथ्य बहुत कम लोग जानते होंगे कि एक समय ऐसा भी आया जब यही हिलेरी माँ गंगा से हार गये थे। जोशीमठ और श्रीनगर के सरकारी दस्तावेजों में हिलेरी के इस अधूरे अभियान का लेखा-जोखा मिलता है।

          सन 1977 मे हिलेरी "सागर से आकाश" नामक इस अभियान में निकले थे। हिलेरी का मकसद था कोलकाता से बद्रीनाथ तक माँ गंगा की धारा के विपरीत जल प्रवाह पर विजय हासिल करना। हिलेरी के इस दुस्साहसी अभियान में तीन जेट नौकाओं का बेडा था। 1- गंगा, 2- एयर इन्डिया, 3- कीवी। हिलेरी की टीम में 18 लोग शामिल थे जिनमें एक उनका बेटा भी था। हिलेरी का यह अभियान उस समय चर्चा का विषय बना हुआ था।देश-विदेश की निगाहें उन पर लगीं थीं।

          हिलेरी कोलकाता से पौढी गढवाल के श्रीनगर तक बिना किसी बाधा के पहुँच गये, यहां कुछ देर रुकने के बाद बद्रीनाथ के लिये निकल पडे।

          हिलेरी से श्रीनगर मे एक पत्रकार ने साक्षात्कार भी लिया था, जिसे श्रीनगर की नगर पालिका की सन 1977 की स्मारिका में भी देखा जा सकता है। पत्रकार ने हिलेरी से पूछा कि "क्या आप अपने इस मिशन में कामयाब हो पायेंगे? हिलेरी ने पूरे आत्मविश्वास से जवाब दिया कि "जरूर, मेरा मिशन जरूर सफ़ल होगा।"

          श्रीनगर से कर्णप्रयाग तक गंगा की लहरें हिलेरी को चुनतियाँ देती रहीं और ललकारती रहीं। नंदप्रयाग के पास गंगा के तेज बहाव और खडी चटानों से घिर जाने पर उनकी नावें आगे नही बढ पायीं। हिलेरी ने तमाम कोशिशें की पर अन्त मे हिलेरी को हार माननी पडी और एडमंड हिलेरी को बद्रीनाथ से काफ़ी पहले नंदप्रयाग से ही वापस लौटना पडा। "सागर से आकाश" तक का हिलेरी का यह अभियान सफ़ल नही हो पाया।

          नंद प्रयाग से हिलेरी सडक मार्ग से वापस लौटे। रास्ते मे उनसे कई लोगों ने कहा कि "माँ गंगा को जीतना सरल नही।"

          माँ गंगा से हार जाने की कसक हिलेरी के मन में आजीवन रही। हिलेरी जब दस साल बाद दोबारा उत्तरकाशी के नेहरू पर्वतारोहण संस्थान में आये तो उन्होने विजिटर बुक में लिखा - "मनुष्य प्रकृति से कभी नही जीत सकता, हमें प्रकृति का सम्मान करना चाहिये।"

जय माँ गंगे-------------------

वन्दे मातरम-----------------

भारत माता की जय-----------