रविवार, 2 अक्तूबर 2022

स्व. लाल बहादुर शास्त्री जी कि मृत्यु का अनसुलझा रहस्य

        



        लाल बहादुर शास्त्री जी की मृत्यु की पहेली कब सुलझेगी, सुलझेगी भी या नहीं?? लेकिन हर वर्ष स्व. लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती पर यह पहेली आने वाली पीढ़ियों को झकझोरती रहेगी, कि क्या शास्त्री जी कि हत्या हुई थी और उस हत्या को छुपाने के लिए दो और हत्याएं की गईं थीं??

        सन १९७७ में केंद्र की सत्ता से काँग्रेसी वर्चस्व के सफ़ाए के बाद प्रचण्ड बहुमत से बनी जनता पार्टी की सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री की संदेहास्पद मृत्यु की जाँच के लिए रामनारायन कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी ने शास्त्री जी की मृत्यु से सम्बन्धित दो प्रत्यक्षदर्शी गवाहों को गवाही देने के लिए बुलाया था। पहले गवाह थे, उस समय ताशकंद में शास्त्री जी के साथ रहे उनके निजी चिकित्सक आर. एन. चुघ। जिन्हे शास्त्री जी की मृत्यु के समय बहुत देर बाद शास्त्री जी के कमरे में बुलाया गया। डा. चुघ के सामने ही शास्त्री जी ने "राम" नाम जपते हुए अपने प्राण त्यागे थे। दूसरे गवाह थे, उनके निजी बावर्ची रामनाथ, जो उस पूरे दौरे के दौरान शास्त्री जी के लिए भोजन बनाते थे। लेकिन शास्त्री जी की मृत्यु वाले दिन भारत के राजदूत टी. एन. कौल ने रामलाल के बजाय अपने खास बावर्ची जान मोहम्मद से शास्त्री जी का भोजन बनवाया था। यहाँ यह उल्लेख बहुत जरूरी है कि ये टीएन कौल कश्मीरी पण्डित था और नेहरू परिवार में उसकी खानदानी निकटता इतनी प्रगाढ़ थी कि सन १९५९ में लाल बहादुर जी के प्रचण्ड विरोध के बावजूद नेहरू ने पहले इन्दिरा गाँधी को कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनवाया और इन्दिरा गाँधी का सलाहकार इसी टी एन कौल को ही बनाया। 

        यह है उस सनसनीखेज रहस्यमय पहेली की संक्षिप्त पृष्ठभूमि जो आज तक नहीं सुलझी है। वो पहेली यह है कि जनता सरकार द्वारा गठित कमेटी ने गवाही के लिए जिन डाक्टर आर एन चुघ को बुलाया था वो कमेटी के सामने गवाही देने के लिए अपनी कार से जब दिल्ली जा रहे थे तब रास्ते में एक ट्रक ने उनकी कार को इतनी बुरी तरह रौंद दिया था कि कार में सवार डाक्टर चुघ, उनकी पत्नी, उनकी पुत्री समेत सभी कि मौत हो गई थी। दूसरे गवाह रामनाथ जब दिल्ली आए और जाँच कमेटी के सामने गवाही देने जा रहे थे तो एक तेज रफ्तार कार ने उनको सड़क पर बुरी तरह रौंद दिया। संयोग से रामनाथ कि तत्काल मौत नहीं हुई थी परंतु सिर पर लगी गम्भीर चोटों के कारण उनकी स्मृति पूरी तरह खत्म हो गई थी। उस दुर्घटना में लगी गम्भीर चोटों के कारण कुछ समय पश्चात उनकी भी मौत हो गई। उल्लेखनीय है कि स्व. शास्त्री जी की पत्नी ललिता शास्त्री जी ने उस समय बताया था कि कमेटी के सामने गवाही देने जाने से पहले उस दिन रामनाथ उनसे मिलने आए थे और यह कह कर गए थे कि "बहुत दिन का बोझ था अम्मा, आज सब बता देंगें।"

        शास्त्री जी की मृत्यु की जाँच कर रही कमेटी के सामने गवाही देने जा रहे दोनों प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की ऐसी मौत क्या केवल संयोग हो सकती है?

        उपरोक्त घटनाक्रम आज कई साल बीत जाने के बाद भी एक पहेली की तरह यह सवाल पूछ रहा है कि क्या शास्त्री जी की हत्या का रहस्य छुपाने के लिए दो और हत्याएं की गईं थीं?

        पता नहीं यह पहेली कब सुलझेगी, सुलझेगी भी या नहीं? लेकिन हर वर्ष स्व. लाल बहादुर शास्त्री जी की जयन्ती पर यह पहेली आने वाली पीढ़ियों को सदियों तक झकझोरती रहेगी। 

        मात्र डेढ़ वर्ष के अपने कार्यकाल में "जय जवान जय किसान" के अपने अमर नारे के साथ देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की अपनी ऐतिहासिक उपलब्धि वाले शास्त्री जी कितनी दृढ़ इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति थे यह इसी से समझा जा सकता है कि अन्तरराष्ट्रीय नियमों, दबावों, तनावों को ताक पर रख कर देशहित में उनके द्वारा लिए एक साहसिक निर्णय ने ही सन १९६५ के भारत-पाक युद्ध का रुख पूरी तरह से भारत के पक्ष में कर दिया था। 

        ऐसी दृढ़ इच्छाशक्ति वाले जननायक के लिए देश में दशकों तक एक सुनियोजित अफवाह फैलाई गई कि ताशकंद में समझौता करने का दबाव नहीं सह सकने के कारण शास्त्री जी को हार्टअटैक पड़ गया था, जिसके कारण उनकी मृत्यु हो गई थी। 

        सच क्या है इसका फैसला एक दिन जरूर होगा और दुनिया के सामने सच जरूर आएगा। इसी आशा एवं अपेक्षा के साथ माँ भारती के महान सपूत "लाल बहादुर शास्त्री जी" को उनकी जन्म-जयन्ती पर कोटि-कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धाजलि । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें