शनिवार, 19 नवंबर 2022

रानी लक्ष्मी बाई




दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी। 

            यह कविता हम बचपन से सुनते और गुनगुनाते आ रहे हैं, इन पंक्तियों से हमे झांसी की रानी लक्ष्मी बाई के शौर्य और अदम्य साहस का पता चलता है और हमारी रगों मे उत्साह-उमंग की लहर दौड़ जाती है। 

            रानी लक्ष्मी बाई मराठा शासित झांसी राज्य की महारानी थी। रानी लक्ष्मी बाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में हुआ था। रानी लक्ष्मी बाई उन महिलाओं में से एक थीं, जिन्होंने ब्रिटिश सरकार से लोहा लेकर उन्हे धूल चटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने महज 29 वर्ष की उम्र में ही अँग्रेजों के खिलाफ युद्ध किया और रणभूमि में ब्रिटिश सरकार को अपनी वीरता का परिचय देते हुए अपने शौर्य को दर्शाया। 

            रानी लक्ष्मी बाई के बचपन का नाम मणिकर्णिका था। उन्हे लोग प्यार से मनु के नाम से भी पुकारते थे। उनके पिता का नाम मोरोपंत ताँबे तथा माँ का नाम भागीरथी बाई था। रानी लक्ष्मी बाई ने बचपन से ही शास्त्रों की शिक्षा के साथ-साथ शस्त्र चलाना भी सीखा था, जिसमे तलवारबाजी में उन्हे महारत हासिल थी। 

            सन 1842 में मणिकर्णिका का विवाह झांसी के मराठा शासक राजा गंगाधर राव नेवालकर के साथ हुआ। विवाह के पश्चात उनका नाम लक्ष्मी बाई कर दिया गया। लोग उन्हे रानी लक्ष्मी बाई के नाम से जानने लगे। विवाह के बाद सन 1851 में रानी लक्ष्मी बाई ने एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन वह 4 माह ही जीवित रहा। इसके बाद रानी लक्ष्मी बाई और राजा गंगाधर राव ने एक पुत्र को गोद लिया, जिसका नाम उन्होंने दामोदर राव रखा। पुत्र को खो देने के बाद राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य खराब रहने लगा। 21 नवंबर 1853 को रानी लक्ष्मी बाई ने अपने पति को खो दिया। राजा गंगाधर राव के निधन के बाद झांसी राज्य की सारी जिम्मेदारी रानी लक्ष्मी बाई के ऊपर आ गई। 

            रानी लक्ष्मी बाई के शासन मे झांसी 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रमुख केंद्र बन कर उभरा। इसी दौरान रानी लक्ष्मी बाई ने झांसी राज्य मे एक मजबूत सेना का गठन किया। इस सेना में पुरुषों के अलावा कई महिलाएं भी शामिल थी। रानी लक्ष्मी बाई की हमशक्ल झलकारी बाई को सेना का प्रमुख बनाया गया। रानी लक्ष्मी बाई की सेना में कई ऐसे महारथी थे जिनको युद्ध का काफी अनुभव था, इनमें दोस्त खान, रघुनाथ सिंह, लाला भाऊ बक्शी, मोती बाई, सुंदर - मुन्दर आदि कुछ महारथी थे। 

            10 मई 1857 को मेरठ में ब्रिटिश सेना मे भारतीय सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह देश के कई राज्यों में बढ़ता चल गया। सन 1858 में सर ह्यू रोज़ के नेतृत्व में अँग्रेजों ने झांसी पर हमला कर दिया। झांसी की ओर से बहादुर सेनापति तात्या टोपे के नेतृत्व में 20000 सैनिकों के साथ अंग्रेज सेना से डट कर मुकाबला किया। यह युद्ध 2 सप्ताह तक चला। अँग्रेजों ने किले की कई दीवारों को तोड़ दिया तथा किले में कई जगह कब्जा कर लिया, फिर अंग्रेज झांसी पर कब्जा करने में सफल हो गए। किसी तरह रानी लक्ष्मी बाई वहाँ से निकालने में सफल रहीं और वे कालपी पहुँच गईं। 

            अँग्रेजों ने सर ह्यू रोज़ के नेतृत्व में 22 नवंबर 1858 को कालपी पर आक्रमण किया। इस बार रानी लक्ष्मी बाई ने वीरता का परिचय देते हुए तथा पूरी रणनीति अपनाते हुए अँग्रेज सेना से लोहा लिया। अँग्रेज सेना को हार का मुँह देखना पड़ा और अँग्रेज सेना पीछे हट गई। सर ह्यू रोज़ ने दोबारा धोखे से कालपी पर हमला कर दिया, जिसमे रानी लक्ष्मी बाई को हार का सामना करना पड़ा। 

            युद्ध में परास्त होने के बाद रानी लक्ष्मी बाई ने अपने लक्ष्य को सफल बनाने के लिए ग्वालियर पर चढ़ाई कर दी। कई मुख्य योद्धा नाना साहब पेशवा, तात्या टोपे तथा बाँदा के नवाब के साथ मिलकर युद्ध किया और अँग्रेजों के गुलाम ग्वालियर के महाराजा को परास्त किया, तथा ग्वालियर के किले पर कब्जा कर लिया। ग्वालियर के किले को संभालने के लिए अपने साथी पेशवा को सौंप दिया। 

            रानी लक्ष्मी बाई ने ग्वालियर के पूर्व क्षेत्र की कमान संभाली। उनकी सेना में पुरुषों के अलावा महिलाएं भी शामिल थीं। अँग्रेज रानी लक्ष्मी बाई को न पहचान सकें इस लिए रानी पुरुष की पोशाक में युद्ध करती थीं। इस युद्ध में रानी काफी घायल हुई, सर पर तलवार लगने के कारण वे अपने घोड़े से नीचे गिर गईं, अँग्रेज उन्हे नहीं पहचान पाए और उन्हे वहीं छोड़ दिया। जहाँ से उनके सैनिक उनका पार्थिव शरीर गंगादास मठ ले गए एवं अंतिम संस्कार किया। 

            यह थी वीरांगना महारानी लक्ष्मी बाई की वीरता की कहानी की छोटी सी झलक। 

महारानी लक्ष्मी बाई अमर रहें 

वन्दे मातरम 

भारत माता की जय 


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