रविवार, 2 अक्टूबर 2022

स्व. लाल बहादुर शास्त्री जी कि मृत्यु का अनसुलझा रहस्य

        



        लाल बहादुर शास्त्री जी की मृत्यु की पहेली कब सुलझेगी, सुलझेगी भी या नहीं?? लेकिन हर वर्ष स्व. लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती पर यह पहेली आने वाली पीढ़ियों को झकझोरती रहेगी, कि क्या शास्त्री जी कि हत्या हुई थी और उस हत्या को छुपाने के लिए दो और हत्याएं की गईं थीं??

        सन १९७७ में केंद्र की सत्ता से काँग्रेसी वर्चस्व के सफ़ाए के बाद प्रचण्ड बहुमत से बनी जनता पार्टी की सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री की संदेहास्पद मृत्यु की जाँच के लिए रामनारायन कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी ने शास्त्री जी की मृत्यु से सम्बन्धित दो प्रत्यक्षदर्शी गवाहों को गवाही देने के लिए बुलाया था। पहले गवाह थे, उस समय ताशकंद में शास्त्री जी के साथ रहे उनके निजी चिकित्सक आर. एन. चुघ। जिन्हे शास्त्री जी की मृत्यु के समय बहुत देर बाद शास्त्री जी के कमरे में बुलाया गया। डा. चुघ के सामने ही शास्त्री जी ने "राम" नाम जपते हुए अपने प्राण त्यागे थे। दूसरे गवाह थे, उनके निजी बावर्ची रामनाथ, जो उस पूरे दौरे के दौरान शास्त्री जी के लिए भोजन बनाते थे। लेकिन शास्त्री जी की मृत्यु वाले दिन भारत के राजदूत टी. एन. कौल ने रामलाल के बजाय अपने खास बावर्ची जान मोहम्मद से शास्त्री जी का भोजन बनवाया था। यहाँ यह उल्लेख बहुत जरूरी है कि ये टीएन कौल कश्मीरी पण्डित था और नेहरू परिवार में उसकी खानदानी निकटता इतनी प्रगाढ़ थी कि सन १९५९ में लाल बहादुर जी के प्रचण्ड विरोध के बावजूद नेहरू ने पहले इन्दिरा गाँधी को कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनवाया और इन्दिरा गाँधी का सलाहकार इसी टी एन कौल को ही बनाया। 

        यह है उस सनसनीखेज रहस्यमय पहेली की संक्षिप्त पृष्ठभूमि जो आज तक नहीं सुलझी है। वो पहेली यह है कि जनता सरकार द्वारा गठित कमेटी ने गवाही के लिए जिन डाक्टर आर एन चुघ को बुलाया था वो कमेटी के सामने गवाही देने के लिए अपनी कार से जब दिल्ली जा रहे थे तब रास्ते में एक ट्रक ने उनकी कार को इतनी बुरी तरह रौंद दिया था कि कार में सवार डाक्टर चुघ, उनकी पत्नी, उनकी पुत्री समेत सभी कि मौत हो गई थी। दूसरे गवाह रामनाथ जब दिल्ली आए और जाँच कमेटी के सामने गवाही देने जा रहे थे तो एक तेज रफ्तार कार ने उनको सड़क पर बुरी तरह रौंद दिया। संयोग से रामनाथ कि तत्काल मौत नहीं हुई थी परंतु सिर पर लगी गम्भीर चोटों के कारण उनकी स्मृति पूरी तरह खत्म हो गई थी। उस दुर्घटना में लगी गम्भीर चोटों के कारण कुछ समय पश्चात उनकी भी मौत हो गई। उल्लेखनीय है कि स्व. शास्त्री जी की पत्नी ललिता शास्त्री जी ने उस समय बताया था कि कमेटी के सामने गवाही देने जाने से पहले उस दिन रामनाथ उनसे मिलने आए थे और यह कह कर गए थे कि "बहुत दिन का बोझ था अम्मा, आज सब बता देंगें।"

        शास्त्री जी की मृत्यु की जाँच कर रही कमेटी के सामने गवाही देने जा रहे दोनों प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की ऐसी मौत क्या केवल संयोग हो सकती है?

        उपरोक्त घटनाक्रम आज कई साल बीत जाने के बाद भी एक पहेली की तरह यह सवाल पूछ रहा है कि क्या शास्त्री जी की हत्या का रहस्य छुपाने के लिए दो और हत्याएं की गईं थीं?

        पता नहीं यह पहेली कब सुलझेगी, सुलझेगी भी या नहीं? लेकिन हर वर्ष स्व. लाल बहादुर शास्त्री जी की जयन्ती पर यह पहेली आने वाली पीढ़ियों को सदियों तक झकझोरती रहेगी। 

        मात्र डेढ़ वर्ष के अपने कार्यकाल में "जय जवान जय किसान" के अपने अमर नारे के साथ देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की अपनी ऐतिहासिक उपलब्धि वाले शास्त्री जी कितनी दृढ़ इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति थे यह इसी से समझा जा सकता है कि अन्तरराष्ट्रीय नियमों, दबावों, तनावों को ताक पर रख कर देशहित में उनके द्वारा लिए एक साहसिक निर्णय ने ही सन १९६५ के भारत-पाक युद्ध का रुख पूरी तरह से भारत के पक्ष में कर दिया था। 

        ऐसी दृढ़ इच्छाशक्ति वाले जननायक के लिए देश में दशकों तक एक सुनियोजित अफवाह फैलाई गई कि ताशकंद में समझौता करने का दबाव नहीं सह सकने के कारण शास्त्री जी को हार्टअटैक पड़ गया था, जिसके कारण उनकी मृत्यु हो गई थी। 

        सच क्या है इसका फैसला एक दिन जरूर होगा और दुनिया के सामने सच जरूर आएगा। इसी आशा एवं अपेक्षा के साथ माँ भारती के महान सपूत "लाल बहादुर शास्त्री जी" को उनकी जन्म-जयन्ती पर कोटि-कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धाजलि । 

शुक्रवार, 30 सितंबर 2022

थाईलैंड और राम-राज्य

 भारत के बाहर थाईलैंड में आज भी संवैधानिक रूप मे राम-राज्य है। वहाँ भगवान श्री राम के छोटे पुत्र कुश के वंशज सम्राट "भूमिबल अतुल्य तेज" राज कर रहे हैं। जिन्हे नवां राम कहा जाता है। 


- भगवान राम का संक्षिप्त इतिहास - 

वाल्मीकि रामायण एक धार्मिक ग्रंथ होने के साथ एक एतिहासिक ग्रंथ भी है। महर्षि वाल्मीकि राम के समकालीन थे। रामायण के बालकाण्ड के सर्ग ७०, ७१, और ७३ में राम और उनके तीनों भाइयों के विवाह का वर्णन है। जिसका सारांश है-

'मिथिला के राजा सीरध्वज थे, जिन्हे लोग विदेह और जनक भी कहते थे। उनकी पत्नी का नाम सुनेत्रा (सुनयना) था। उनकी पुत्री सीता जी थी। जिनका विवाह राम से हुआ था।'

राजा जनक के कुशध्वज नाम के भाई थे। इनकी राजधानी साँकाश्य नगर थी, जो इक्षुमती नदी के किनारे थी। इन्होंने अपनी बेटी उर्मिला का लक्ष्मण से, माँडवी का भरत से और श्रुतिकीर्ति का विवाह शत्रुघ्न से कर दिया। 

केशव दास रचित "रामचंद्रिका" के पृष्ठ ३५४ के अनुसार, राम और सीता के पुत्र लव और कुश, लक्ष्मण और उर्मिला के पुत्र अंगद और चंद्रकेतु, भरत और माँड़वी के पुत्र पुष्कर और तक्ष, शत्रुघ्न श्रुतिकीर्ति के पुत्र सुबाहु और शत्रुघात हुए। 

श्रीराम के समय ही राज्यों का बँटवारा इस प्रकार हुआ था - पश्चिम मे लव को लवपुर (लाहौर), पूर्व मे कुश को कुशावती, तक्ष को तक्षशिला, अंगद को अंगद नगर, चंद्रकेतु को चंद्रावती।

कुश ने अपना राज्य पूर्व की तरफ फैलाया और एक नागवंशी कन्या से विवाह किया था। थाईलैंड के राजा उन्ही कुश के वंशज हैं। इस वंश को "चक्री वंश" कहा जाता है। चूँकि राम को विष्णु का अवतार माना जाता है और विष्णु का आयुध चक्र है इसलिए ये वंश चक्री वंश कहलाता है। इसीलिए थाईलैंड के लोग चक्री वंश के हर राजा को "राम" की उपाधि देकर साथ मे एक संख्या देते हैं। जैसे- अभी राम (९ वें) राजा हैं। जिनका नाम "भूमिबल अतुल्य तेज" है।

थाईलैंड की अयोध्या-
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लोग थाईलैंड की राजधानी को अंग्रेजी में बैंगकाक (Bangkok) कहते हैं। क्योंकि इसका सरकारी नाम इतना बड़ा है कि इसे विश्व का सबसे बड़ा नाम माना जाता है। इसका नाम संस्कृत शब्दों से मिलकर बना है। देवनागरी लिपि में पूरा नाम इस प्रकार है-

" क्रुङ्ग देव महानगर अमर रत्न कोसिन्द्र महिंद्रायुद्धा महातिलक भव नवरत्न राजधानी पुरी रम्य उत्तम राज निवेशन महास्थान अमर विमान अवतार स्थित शक्रदत्तीय विष्णु कर्म प्रसिद्ध "

थाई भाषा में इस पूरे नाम में १६३ अक्षरों का प्रयोग किया गया है। इस नाम की एक और विशेषता है, इसे बोला नहीं जाता बल्कि गा कर कहा जाता है। कुछ लोग आसानी के लिए "महेंद्र अयोध्या" (इन्द्र द्वारा निर्मित महान अयोध्या) भी कहते हैं। थाईलैंड के जितने भी राम (राजा) हुए हैं सभी इसी अयोध्या में रहते आए हैं।

थाईलैंड में संवैधानिक लोकतंत्र की स्थापना सन १९३२ में हुई। बौद्ध होने के बावजूद थाईलैंड के लोग अपने राजा को राम का वंशज होने से विष्णु का अवतार मानते हैं। इसलिए थाईलैंड में एक तरह से रामराज्य है। वहाँ के राजा को भगवान श्रीराम का वंशज माना जाता है।

भगवान राम के वंशजों की यह स्थिति है कि उन्हे निजी या सार्वजनिक तौर पर कभी भी विवाद या आलोचना के घेरे में नहीं लाया जा सकता है, क्योंकि वे पूजनीय हैं। थाई शाही परिवार के सदस्यों के सम्मुख थाई जनता उनके सम्मानार्थ सीधे खड़ी नहीं हो सकती है, बल्कि उन्हे झुककर खड़े होना पड़ता है। मौजूदा समय के राजा की तीन पुत्रियाँ हैं। उनमें से एक हिन्दू धर्म की मर्मज्ञ मानी जाती हैं।

थाईलैंड का राष्ट्रीय ग्रन्थ
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थाईलैंड में थेरावाद बौद्ध लोग बहुसंख्यक हैं, परन्तु वहाँ का राष्ट्रीय ग्रन्थ रामायण ही है। जिसे थाई भाषा मे "राम-किएन" कहते हैं। राम-कियेन का अर्थ "राम-कीर्ति" है, जो कि वाल्मीकि रामायण पर आधारित है। इस ग्रन्थ की मूल प्रति सन १७६७ मे नष्ट हो गई थी, जिसे चक्री राजा प्रथम राम (१७३६-१८०९), ने अपनी स्मरण शक्ति से पुनः लिपिबद्ध कर लिया था। थाईलैंड मे रामायण को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करना इसलिए संभव हुआ, क्योंकि वहाँ हिन्दू धर्म के आराध्य श्रीराम पर अटूट श्रद्धा है। 

थाईलैंड में राम कियेन पर आधारित नाटक और कठपुतलियों का प्रदर्शन करना और उसे देखना धार्मिक कार्य माना जाता है। राम कियेन के मुख्य पात्रों के नाम इस प्रकार हैं -

१- राम (राम), २- लक (लक्ष्मण), ३- पाली (बाली), ४- सुक्रीप (सुग्रीव), ५- ओंकोट (अंगद), ६- खोमपून (जांबवंत), ७- बिपेक (विभीषण), ८- तोतस कन (दशकण्ठ, रावण), ९- सदायु (जटायु), १०- सुपन माच्छा (शूर्पणखा), ११- मारित (मारीच), १२- इन्द्रचित (इंद्रजीत, मेघनाथ), १३- फ्र पाई (वायु देव ) इत्यादि। थाई राम कियेन में हनुमान की पुत्री और विभीषण की पत्नी के नामों का भी उल्लेख है। 

थाईलैंड में बौद्ध भी जिन हिन्दू देवताओं की पूजा करते हैं, उनके नाम इसप्रकार हैं-

१- ईसुअन (ईश्वर, शिव), २- नाराइ (नारायण, विष्णु), ३- फ्राम (ब्रह्म, ब्रह्मा), ४- इन (इन्द्र), ५- आथित (आदित्य, सूर्य) ६- पाय (पवन, वायु)। 

थाईलैंड का राष्ट्रीय चिन्ह गरुड है। गरुड एक बड़े आकार का पक्षी है, जो लगभग लुप्त हो चुका है। अंग्रेजी में इसे ब्राह्मणी पक्षी (The Brahminy Kite) कहा जाता है। फ्रेंच पक्षी विशेषज्ञ मथुरिन जैक्स ब्रिसन ने इसे सन १७६० में पहली बार दक्षिण भारत के पांडिचेरी शहर के पहाड़ों मे देखा था और इसका नाम Falco indus रख दिया था। इस से सिध्द होता है कि गरुड कोई काल्पनिक पक्षी नहीं है। भारतीय पौराणिक ग्रन्थों में गरुड को विष्णु का वाहन माना गया है। चूँकि राम, विष्णु के अवतार हैं और थाईलैंड के राजा राम के वंशज हैं तथा बौद्ध होने पर भी हिन्दू धर्म में अटूट आस्था रखते हैं, इसलिए उन्होंने गरुड को थाईलैंड का राष्ट्रीय चिन्ह घोषित किया है। थाई संसद के सामने भी गरुड़ बना हुआ है। 

थाईलैंड की राजधानी के हवाई अड्डे का नाम सुवर्ण भूमि है। यह आकार के मुताबिक दुनिया का दूसरे नंबर का हवाई अड्डा है। इसके स्वागत हाल के अन्दर समुद्र मंथन का दृश्य बना हुआ है। जो भी व्यक्ति हवाई अड्डे के हाल में जाता है वो इस दृश्य को देख कर मंत्रमुग्ध हो जाता है। 


आशा है की थाईलैंड के विषय मे यह जानकारी आपको पसंद आई होगी। 


जय श्री राम 

वन्दे मातरम 

रविवार, 25 सितंबर 2022

सह-अस्तित्व की महत्ता (लघु कथा)

॥ सह-अस्तित्व के अभाव में व्यक्तिगत अस्तित्व का कोई अस्तित्व नहीं ॥ 


बनते हुए विशाल भवन के पास लगे ईंटों के ढेर ने कहा- 'गगनचुंबी अट्टालिकाओं का निर्माण हमारे अस्तित्व पर आधारित है, उसका शिलान्यास ही न हो तो कई मंजिलों की बात तो दूर रही एक दीवाल का खड़ा होना भी मुश्किल है। भवन के आकार और आधार का श्रेय हमें ही तो है।'


गारे ने ईंटों की गर्व भरी वाणी सुनी तो उससे न रहा गया। गारे ने कहा- 'इतना झूठ क्यों बोलते हो। क्या तुम नहीं जानते कि एक सूत्र मे पिरोकर ईंट-ईंट को जोड़कर सुदृढ़ता प्रदान करने का श्रेय हमें ही है। गारे के अभाव में ईंटों का ढेर ठोकर मारकर गिराया जा सकता है।'


किवाड़ और खिड़कियों ने भी प्रतिवाद किया- 'गारे भाई ! यह कौन नहीं जानता कि ईंटों को जोड़कर तुम दीवारें खड़ी करते हो। परन्तु यदि उस मकान में खिड़की-दरवाजे न होंगे तो ऐसे असुरक्षित मकान में कोई रहने को भी तैयार न होगा। भवन की पूर्णता तो हम पर ही निर्भर करती है।'


शिल्पी उनकी बात चुपचाप सुन रहा था, वह बोला- 'आप लोगों में भले ही कितनी ही पारस्परिक सहयोग की भावना बढ़ जाए पर सबको एक सूत्र में पिरोने वाला तो मैं ही हूँ। यदि मेरा हाथ न लगे तो ईंट, गारा और किवाड़ अपने-अपने स्थान पर ही पड़े रहेंगे। मेरे शिल्प के बिना आपका कोई अस्तित्व नहीं।'


तब भवन ने फिर एक बार सोचा- "सह-अस्तित्व के अभाव में व्यक्तिगत अस्तित्व का कोई महत्व नहीं। झूठे अभिमान को छोड़कर दूसरों के महत्व को भी समझना चाहिए।"


वंदे मातरम 

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

पृथ्वी न्यूज़ पेपर ( हास्य रचना )



हास्य रचना ------

(प्रस्तुत हास्य रचना कल्पना पर आधारित हास्य मात्र है। पृथ्वी से एक समाचार पत्र प्रकाशित होता है, जिसके संवाददाता सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मे फ़ैले हुए हैं। जो कि अपने समाचार इस पृथ्वी न्यूज़ पेपर को भेजते है। प्रस्तुत है स्वर्ग से आए संवाददाता की रिपोर्ट) 

पृथ्वी न्यूज़ पेपर


                    आज स्वर्ग के संवाददाता स्वर्ग का भ्रमण कर वहाँ के समाचारों के साथ वापस धरती पर आ गये। संवाददाता ने बताया कि काफ़ी समय पूर्व ब्रह्मा जी ने पतियों के अनुकूल चलने वाली " पत्नी निर्माण" कारखाने को बन्द कर दिया है, तथा अब वहाँ पति के अनुकूल चलने वाली पत्नियों का "पुराना स्टाक" भी समाप्त हो गया है। इस तरह से अब ये तय हो गया है कि पति जो कहीं-कहीं "भेड़" के रूप में दिखता था अब कुछ ही समय में हर स्थान पर सुलभ होगा। "कर्कशा-पत्नियाँ" हर गली-कूचे-घर-कमरे-झोपड़ी में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होंगी, जो कि अपने-अपने "भेड़-पति" को अपने आदेशानुसार संचालित कर रही होंगीं।

                    वहीं विश्वस्त सूत्रों से हमारे संवाददाता को यह भी पता चला है कि भविष्य में होने वाले इस खतरे रूपी परिवर्तन पर पतियों और पति बनने की राह देख रहे "भावी पतियों" में खलबली मच गई है और उन्होने ऐसी स्थिति से निपटने के लिये इस पर कड़ी निगाह रखनी शुरू कर दी है, परन्तु "पत्नी-भय" के कारण संगठित नहीं हो पा रहे हैं।

                    हमारे संवाददाता ने कई "पत्नी-भय से क्लान्त पतियों" से बात करने की कोशिश की, ये भयभीत पति बात भी करना चाहते थे परन्तु अपनी पत्नियों की छवि को अपनी आँखों से दूर न कर पाने के कारण कुछ भी बात करने में असमर्थ रहे।

                    पृथ्वी पर संचालित सरकारें भी भविष्य में आने वाले इस "कर्कशा-पत्नी-भूचाल" से घबरा गईं हैं और इनसे निपटने की कार्ययोजना बना रही हैं, परन्तु इन्हे भी कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है।

               अब सब कुछ ब्रह्मा जी पर निर्भर है कि वे जल्द से जल्द "पतिनुकूल पत्नियों" का उत्पादन शुरू करें और पृथ्वी समेत सम्पूर्ण सृष्टि को इस भयावह स्थिति से निजात दिलायें।

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-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

( इस हास्य का मकसद किसी को किसी भी प्रकार का कष्ट देना नहीं है, फ़िर भी प्रस्तुत हास्य से किसी को भी किसी भी प्रकार का कष्ट पहुँचा हो तो मैं लेखक के रूप मे क्षमा प्रार्थी हूँ - गोपाल कृष्ण शुक्ल)

शनिवार, 28 मार्च 2015

शब्दाघात

                         शब्द ब्रह्म है और शब्द ही आघात भी। ब्रह्म जहाँ मन को शान्ति प्रदान करता है वहीं आघात मन और शरीर दोनो को कष्ट देता है, क्षति पहुँचाता है। तलवार जो कि शरीर पर चोट करती है, घाव भी देती है, उसकी चोट से, उसके घाव से और उसकी पीड़ा से चिकित्सा द्वारा आराम मिल जाता है, परन्तु शब्द द्वारा किये गये आघात से पैदा हुए घाव को, पीड़ा को किस चिकित्सा से, किस औषधि से ठीक करें, यह पहचान करना मुश्किल होता है।

                         यह सब जानते हुए भी हम अपने शब्दों/वाक्यो से, लोगों को, अपने करीबियों को, अपने हितैषियों को अपने प्रति समर्पण का भाव रखने वालों को आघात पहुँचाते रहते हैं। हम यह भी नहीं सोचते कि जिसके प्रति हमने ऐसे शब्द प्रयोग किये जिससे उसे आघात पहुँचा उसकी मनःस्थिति कैसी हो रही होगी, उसको कितनी आन्तरिक पीड़ा हो रही होगी। हमें अपने मुख से बोलने के पहले अपने द्वारा कहे जा रहे शब्द/वाक्य पर विचार कर लेना चाहिये जिससे उस शब्द/वाक्य को सुनने पढ़ने वाला व्यथित न हो। हमें हमेशा यह ध्यान रखना चाहिये कि मुख से निकले हुए शब्द/वाक्य को वापस नहीं लिया जासकता। वह शब्द/वाक्य अपनी प्रकृति के अनुसार प्रेम का प्रदर्शन या शब्दाघात तो करेगा ही।

                         जाने-अनजाने हमने भी कई बार ऐसा आघात किया होगा, जिससे लोगों को कष्ट पहुँचा होगा, लोग व्यथित हुए होगें। 

                         सभ्य पुरुष वही है जो अपने ऐसे जाने-अनजाने अपराध को स्वीकार करे और भविष्य मे ऐसे हृदय-आघातिक अपराध न करे। यदि हम अभी भी चेत जायें तो ऐसे अपराध से बच सकते है।


---- इति

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

दुखी मन

                         मानव के दुखों का कारण मन की वृत्तियों पर व्यक्ति के नियन्त्रण का अभाव है। यह अभाव इस कारण है कि व्यक्ति के पास मन तो है पर "मनन" नहीं।

                         अगर मन व्यक्ति का दास हो जाये तो सजग व्यक्ति अच्छा-बुरा पहचान कर मन को अच्छाई मे लगा कर बुराई को रोक सकता है। तब उस व्यक्ति के पास शान्ति ही शान्ति रहेगी।

                         आज के भौतिकतावादी समाज में आगे बढने की होड में मनुष्य मन को ही अपना विवेक, ग्यान, समझदारी आदि सौंप कर स्वयं उसका गुलाम बना बैठा है। जब कि मन उसका है, उसे स्वामी बन कर मन को अपनी कुशलता एवं आवश्यकतानुसार चलाना चाहिये।

                         मन का सकारात्मक दिशा में प्रयोग जहाँ एक ओर परम सत्य का अनुरागी बना देता है वहीं दूसरी ओर मन का नकारात्मक प्रयोग क्लेश, दुख और अशान्ति के द्वार खोल देता है।

                         वर्तमान समय में मानव के दुख, रुदन, अवसाद आदि का मूल कारण मन की विभ्रान्त स्थिति ही है, जो मन को भटकाये रहती है। भटकते रहने वाला मन कभी भी संसार के वास्तविक स्वरूप का आंकलन नही करने देता। इस संसार के स्वरूप के सत्य ग्यान का अभाव मानव अस्तित्व को ही संकट मे डाले रहता है। इस कारण ग्यान-चक्षुओं को बन्द किये हुए मानव पैसे को ही सब-कुछ मानकर  स्वयं पैसा बन कर रह गया है।

                         मन बहुत चंचल है। इतना चंचल कि कोई अगर चाहे कि पकड कर इसे रोक ले तो यह असंभव है। जितना इसे रोकना चाहेंगें उतना ही तेजी से ये भागेगा। मन की यह तेजी बताती है कि इसमे अपार शक्ति है। यह क्षण भर में संसार के पार दूसरे लोक में पहुँच सकता है तथा पल भर में ही फ़िर अपनी पसन्द की क्रीडा में लग सकता है। 

                         यदि हम चाहें तो अपने दृढ संकल्प के बल पर मन को युक्तिपूर्वक एक स्थान पर रोक कर अनन्त शक्ति के धनी बन सकते हैं। यह कार्य कठिन नही, सिर्फ़ सार्थक प्रयास की आवश्यकता है।


गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

धर्म के लक्षण

धर्म के लक्षण
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धारणाद धर्ममित्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः

धर्म सभी प्राणियों का धारण-पोषण करता है, इसलिये महर्षियों ने उसे धर्म कहा है।

वेद, स्मृति, सदाचार और आत्मतुष्टि अर्थात अपनी आत्मा को प्रिय लगने वाला - ये धर्म के साक्षात लक्षण हैं।

हिंसा न करना, सच बोलना, चोरी न करना, पवित्र रहना और इन्द्रियों को संयम मे रखना - महर्षियों ने संक्षेप मे इसी को धर्म बताया है।

धर्म के दस लक्षण
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धृति, क्षमा, दम, चोरी न करना, मन, वाणी और शरीर की पवित्रता, इन्द्रियों का संयम, सुबुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना।

क्रूरता न करना (दया), क्षमा, सत्य, अहिंसा, दान, नम्रता, प्रीति, प्रसन्नता, कोमल वाणी और कोमलता - ये दस यम हैं।

पवित्रता, यग्य, तप, दान, स्वाध्याय, ब्रह्मचर्य, व्रत, मौन, उपवास और स्नान - ये दस नियम हैं।

दया करो किसी को मत मारो पराया हो या अपना, भाई-बन्धु या मित्र हो, शत्रु हो या बैरी - जो विपत्तियों में पडा हो, उसे दुख में देखकर उसकी रक्षा करने का नाम है, दया - करुणा।

जो आदमी माँस खाता है वही घातक नहीं है, आठ व्यक्ति घातक है - १- माँस के लिये सम्म्ति देनेवाला, २- काटने वाला, ३- मारने वाला, ४- खरीदने वाला, ५- बेचने वाला, ६- लाने वाला, ७- पकाने वाला, ८- खाने वाला।

पंच महायग्य
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गृहस्थ के आवास में हिंसा के ये पाँच स्थान हैं - चूल्हा, चक्की, झाडू, ओखली और पानी के घडे। इनसे वह पाप में बँधता है। गृहस्थों को इन दोषों से मुक्त करने के लिये महर्षियों ने प्रतिदिन पंच महायग्य करने को निर्देशित किया है।

ये पाँच महायग्य हैं - १- पढाना-(ब्रह्मयग्य), २- तर्पण-(पितृयग्य), ३- हवन-(देवयग्य),  ४- बलिवैश्यदेव*- (भूतयग्य), ५- अतिथ-सत्कार-(मनुष्य यग्य)
*बलिवैश्यदेव यग्य मे कुत्ता, पतित, चाँडाल, पाप रोगी, कौआ और कृमि इन छै के लिये भोजन मे से छै भाग निकाले।

प्रणाम करने का जिसे स्वभाव है और जो रोज गुरुजनो की सेवा करता है, उसकी आयु और विद्या, यश और बल, बढते हैं।

जो कार्य माता-पिता और गुरू को प्रिय लगे वही कार्य करना चाहिये। इन तीनों के संतुष्ट होने से सारे तप पूरे हो जाते हैं।

बुधवार, 7 नवंबर 2012

विश्वास का आधार क्या हो ?

"विश्वास का आधार क्या हो ? रूप, रँग, गुण, धर्म, जाति, कुल या शब्द या फ़िर कुछ भी नही। या फ़िर विश्वास किया ही नही जाना चाहिये। अथवा विश्वास सिर्फ़ एक स्वप्न के समान है..? अगर विश्वास न होगा तो फ़िर जीवन को गति कैसे मिलेगी? जिन्हे हम अपना मानते हैं, वो जब हमारे या अपने शब्दों से विमुख हो जाता है तब हम स्तब्ध रह जाते हैं और तब शुरू होता है इस बात का आंकलन कि हमसे भूल कहाँ हुई। तभी विश्वास की नाजुक डोर टूटने लगती है। तब प्रश्न उठता है कि विश्वास का आधार क्या हो............"

स्वप्न और विश्वास में क्या सामंजस्य...? स्वप्न बनते ही हैं टूटने, बिखरने के लिये। स्वप्न हम खुली या बन्द आँखों से अपने मन की धारणाओं के अनुसार गढ लेते है, पर विश्वास की महत्ता अलग है। विश्वास धीरे-धीरे पनपता है और दृढ होता है।

हम सब अपनी धारणाओं की स्वीकृति चाहते हैं, जो हमारी धारणाओं को समर्थन देते हैं, हम उन पर विश्वास करते हैं। पर जब कभी कोई हमारी धारणाओं को मानने वाला हमसे विपरीत हो जाता है तब हम व्यथित हो जाते हैं, हमारे विश्वास को ठेस लगती है और धीरे-धीरे उस व्यक्ति पर से हमारा विश्वास टूट जाता है। तात्पर्य यह है कि हम अपनी धारणायें मनवाने के लिये उतावले रहते हैं और इसी की वजह से परेशान भी।

हम यदि पहले ही व्यक्ति के गाँभीर्य को परख लें तब उसके द्वारा कहे गये शब्द अर्थवान/अर्थहीन हो जाते हैं। तब हमे क्लेश नही होता किसी अपने के द्वारा कहे गये शब्दों से विमुख होने का। यह हम पर निर्भर है कि हम उसको कितना परख पाते हैं। व्यक्ति को परखना हमारे अपने अनुभव पर आधारित है।

विश्वास की डोर नाजुक नही होती। अगर विश्वास की डोर नाजुक है तो वह विश्वास की श्रेणी में आ ही नही सकता। विश्वास तो दृढता से किया जाता है। मन के डावाँडोल होने से अगर विश्वास को ठोकर लगती है तो यह हमारे मन का दोष है न कि विश्वास का।

विश्वास अखण्ड संरचना है। यह टूट नही सकता। यह जरूर है कि विश्वास कभी-कभी गलत हो सकता है। पर गलत विश्वास नही बल्कि जिस व्यक्ति पर विश्वास होता है वह गलत होता है। विश्वास ही जीवन का आधार है। सुखमय संसरण का मूल है। जो विश्वास को नही जानता या नही मानता उसका जीवन धरातल विहीन है, व्यर्थ है। "भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वास रुपिणौ"---- गोस्वामी तुलसीदास की इस पँक्ति का यही है निहितार्थ।


सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

हिन्दू धर्म की पांच प्रमुख सती नारियाँ

स्त्री का पतिव्रता होना स्त्री का प्रमुख गुण है। एक ही पति या पत्नी धर्म का पालन करना हिन्दू धर्म के कर्तव्यों मे शामिल है। भारत में अनगिनत ऐसी महिलायें हुईं हैं जिनकी पतिव्रता पालन की मिसाल दी जाती है। उनमे से कुछ ऐसी हैं जो इतिहास का अमिट हिस्सा बन चुकी हैं।

हिन्दू इतिहास के अनुसार इस संसार मे पाँच सती स्त्रियाँ हुईं, जो क्रमशः इस प्रकार हैं -

१- अनसुइया
२- द्रौपदी
३- सुलक्षणा
४- सावित्री
५- मंदोदरी

१- अनसुइया - पतिव्रता देवियों में अनसुइया का स्थान सबसे ऊँचा है। वे ऋषि अत्रि की पत्नी थी। एक बार त्रिदेव माता अनसुइया की परीक्षा लेने ऋषि अत्रि के आश्रम में भिक्षा मांगने गये और अनसुइया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगीं तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगें। तब माता अनसुइया ने अपने सतीत्व के बल पर तीनों देवों को अबोध बालक बना कर उन्हे भिक्षा दी। यह भी कहा जाता है कि माता अनुसुइया ने श्री राम के वनवास काल मे चित्रकूट प्रवास के समय माता सीता को पतिव्रत धर्म का उपदेश दिया था।

२- द्रौपदी - पाँच पाँडवों की पत्नी द्रौपदी को पाँच कुंवारी कन्याओं में भी गिना जाता है। द्रौपदी के पिता पाँचाल नरेश द्रुपद थे। द्रौपदी के स्वयंवर मे अर्जुन ने अपने वनवास काल में द्रौपदी को वरण किया। अर्जुन अपने अन्य भ्राताओं के साथ द्रौपदी को लेकर माता कुंती के पास अपनी कुटिया में पहुंचे तथा द्वार से ही पुकार कर अर्जुन ने अपनी माता कुंती से कहा, "माते ! आज हम लोग आपके लिये अदभुत भिक्षा ले कर आये हैं।" इस पर कुंती ने भीतर से ही कहा, "पुत्रों ! तुम लोग आपस में मिल-बाँट कर उसका उपभोग कर लो।" बाद में ग्यात होने पर कि भिक्षा वधू के रूप में है, कुंती को बहुत दुख हुआ। किन्तु माता के वचन को सत्य सिद्ध करने के लिये द्रौपदी ने पाँचों पाँडवों को पति के रूप में स्वीकार कर लिया।

३- सुलक्षणा - लंकाधिपति रावण के पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) की पत्नी सुलक्षणा को भी पाँच सती नारियों मे स्थान दिया गया है।

४- सावित्री - महाभारत के अनुसार सावित्री राजर्षि अश्वपति की पुत्री थीं। उनके पति का नाम सत्यवान था। सावित्री के पति सत्यवान की असमय मृत्यु के बाद सावित्री ने अपनी तपस्या के बल पर सत्यवान को यमराज के  हाथों से वापस ले लिया था। सावित्री के नाम से ही वट सावित्री नामक व्रत प्रचलित है।

५ - मंदोदरी - मंदोदरी लंकाधिपति रावण की पत्नी थीं। हेमा नामक अप्सरा मंदोदरी की माता थी तथा मयासुर मंदोदरी के पिता थे। मंदोदरी लंकाधिपति रावण को हमेशा अच्छी सलाह देती थीं। यह भी कहा जाता है कि अपने पति रावण के मनोरंजन हेतु मंदोदरी ने ही शतरंज नामक खेल का आविष्कार किया था।


सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

कानपुर मे सिनेमा

                            ब्रिटिश शासन मे उत्तर भारत में औद्योगिक शुरुआत के साथ सिनेमा की शुरुआत कानपुर से ही हुई। सबसे पहले अंग्रेजों ने स्वयं के लिये कुछ सिनेमाघरों को बनवाया जो कि बाद मे भारतीयों द्वारा खरीद लिये गये। "एस्टर टाकीज" और "प्लाजा टाकीज" अंग्रेजों द्वारा बनाई गई थी जिसे बाद मे भारतीयों ने खरीद लिया, जो कि क्रमशः "मिनर्वा सिनेमा" और "सुन्दर टाकीज" के नाम से मशहूर हुईं।
                       
                        कानपुर मे पहला सिनेमाघर "बैकुँठ टाकीज" के नाम से खुला। जिसकी स्थापना कलकत्ता की एक कम्पनी चरवरिया टाकीज प्रा.लि. ने सन 1929 में की। इस टाकीज को सन 1930 में पंचम सिंह नाम के व्यक्ति ने खरीद लिया और टाकीज का नाम बदल कर "कैपिटल टाकीज" कर दिया। इस सिनेमाघर की पूरी छत टिन की बनी थी, जिस वजह से स्थानीय लोग इसे "भडभडिया टाकीज" भी कहते थे।

                        सन 1930-40 का युग कानपुर सिनेमा का स्वर्णिम युग कहा जाता है। कानपुर में सन 1936 "मँजूश्री टाकीज" (घन्टाघर के पास) का निर्माण हुआ, जिसे प्रसाद बजाज ने बनवाया। सन 1937 मे "शीशमहल टाकीज" (पी.रोड) का निर्माण हुआ। सन 1946 में "जयहिंद सिनेमा" (गुमटी नं. पाँच) बना। सन 1946 में ही जवाहर लाल जैन ने "न्यू बसंत टाकीज" और लाला कामता प्रसाद ने "शालिमार टाकीज" का निर्माण कराया। "शालिमार टाकीज" का नाम बाद मे "डिलाइट सिनेमा" हो गया। सन 1940 में "इम्पीरियल टाकीज" (पी.पी.एन. मार्केट के सामने) का निर्माण हुआ। आगे चलकर सूरज नारायण गुप्ता ने "नारायण टाकीज" (बेगम गंज) का निर्माण कराया।

                        70-80  के दशक मे कई सिनेमाघर खुले, जैसे "हीरपैलेस" (माल रोड), "अनुपम टाकीज" (जूही), "सत्यम टाकीज" (माल रोड), "संगीत टाकीज", "सुन्दर टाकीज" (माल रोड), "गुरुदेव टाकीज", "पम्मी थियेटर" आदि।

                        दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत मे सिनेमाघरों मे छपा टिकट या पास नही चलता था। तब दर्शकों को अपने हाथ मे "मोहर" लगवा कर सिनेमा घर के अन्दर प्रवेश मिलता था।

                        आज तो कानपुर महानगर मे कई मल्टीफ़्ल्र्केज खुल गये है। जैसे “रेव थ्री”, "रेव मोती”, “ज़ेड एस्क्वायर” आदि। परन्तु जो आनन्द का अनुभव सिनेमाघरों मे था वो आनन्द इन मल्टीफ़्लेकसेज मे नही है।

                         यह कानपुर मे सिनेमा का संक्षिप्त "स्वर्णिम इतिहास" है।