सोमवार, 21 जून 2010

तेज पुंज का प्रतीक - भगवा ध्वज

हमारी हिन्दू संस्कृति कि यह विशेषता है कि हमारे जितने श्रद्धा के केंद्र हैं, मान-बिंदु हैं, उनके पीछे कोई न कोई श्रेष्ठ तत्व अवश्य है। आज दुर्भाग्य से वे तत्व सुप्तावस्था में हैं, वे सिद्धांत अमूर्त रूप में हैं और इसी कारण हमारा यह ह्रास दृष्टिगोचर हो रहा है। आज आवश्यकता है उन तत्वों को जागृत अवस्था में, उन सिद्धांतों को मूर्त रूप में लाने की, उनको अपने आचरण में प्रत्यक्ष रूप से कार्यान्वित करने की। इसका एक ही उपाय है किउन तत्वों को, उन सिद्धांतों को बोधगम्य बनाना, उनको ऐसे रूप में सामने रखना जिससे साधारण जनता ठीक प्रकार से समझ सके और हृद्यंगम कर सके।

इन्ही श्रेष्ठ तत्वों की कड़ी में हमारा भगवा ध्वज भी आता है। विचारणीय बात है की हमारा देश कितना समृद्धिशाली देश था, परन्तु आज ---- ? आज की हमारी स्थिति संतोषजनक नहीं है। इस स्थिति से निकलने का केवल एक मार्ग है की हम अपनी संस्कृति को पुनः गौरवशाली बनाने का दृढ निश्चय लेकर समस्त हिन्दू समाज को सुसंघटित करें। यह तभी हो सकता है जब हमारी संस्कृति, हमारी परंपरा का हमें हर समय ध्यान रहे। इसके लिये हमें अपने राष्ट्र ध्वज के साथ साथ अपना पुरातन ' भगवा ध्वज ' भी अपनाना होगा। इस भगवा ध्वज को देखते ही हमे अपने पूर्व गौरव का ध्यान हो आता है। अपनी परंपरा का आँखों के सम्मुख चित्र उपस्थित हो जाता है। इसी भगवा ध्वज के नीचे हुए असंख्य बलिदानों का स्मरण हो आता है। जिनके कारण आज हम खुद को हिन्दू के रूप में जीवित देखते हैं। यह भगवा ध्वज हमारे हिन्दू-राष्ट्र की आशाओं-आकांक्षाओं तथा हिन्दू-राष्ट्र का तेजपुंज प्रतीक है। इस भगवा ध्वज का सम्मान-रक्षण हमारे जीवन का आद्य-कर्तव्य है। यह बात प्रत्येक हिन्दू के मन में जागृत हो तथा इस ध्वज के पीछे जो हमारी संस्कृति का अमूर्त गौरव छिपा है उसे मूर्त रूप देने में कार्यशील हों। यह हम सब हिन्दुओं का कर्तव्य है। ये ही कामना है।

वन्दे मातरम्------

भारत माता की जय------

रविवार, 20 जून 2010

सांस्कृतिक परम्परा

हिन्दू संस्कृति मानव जीवन की शक्ति, प्रगतिशील साधनाओं की विमल विभूति, राष्ट्रीय आदर्श की गौरव मयी मर्यादा और स्वतन्त्रता की वास्तविक प्रतिष्ठा है। इस तथ्य का चिंतन करते हुए हिन्दू परम्परा ने सदा संस्कृति-निष्ठां के मंगलमय मार्ग को अपनाया। फलस्वरूप हिन्दू-संस्कृति भारत भूमि के कण-कण में व्याप्त है, भारतीय साहित्य के पद-पद में ओत-प्रोत है और भारतीय इतिहास के प्रत्येक पृष्ठ पर अंकित है।

इसके अधिष्ठान एवं अनुष्ठान को अक्षुण बनाए रखने के लिये अपेक्षित है सांस्कृतिक आचार्यों के उन आचरणों का अनुशीलन और अनुसरण, जिनके द्वारा हिन्दू संस्कृति के तत्वों की अभिव्यक्ति होती है।

हिन्दू संस्कृति के निर्वाहक इन आचार्यों ने हिन्दू संस्कृति के द्वारा खुद को सुसंस्कृत किया। इसी का सुखद परिणाम है कि विभिन्न दार्शनिक दृष्टिकोणों एवं सैध्दांतिक मतभेदों के रहने पर भी सांस्कृतिक परम्परा की अविच्छिन्न गति में किसी प्रकार का अंतर न पड़ सका। आत्म-कल्याण के साधनों में विविधता आने पर भी सर्वभूतहित की भावना पर किसी प्रकार की ठेस न लगाने पायी। उसी परम्परा के अनुसरण करने में ही मानव जाति का कल्याण है।

वन्दे मातरम---------

भारत माता की जय------

गुरुवार, 17 जून 2010

हिन्दू संस्कृति के गुण

क्षमा, दया, शांति, संतोष, शम, दम, धैर्य, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, तेज, विनय, सरलता, धीरता, वीरता, गंभीरता, निर्भयता, निराभिमानता, ह्रदय कि पवित्रता, आस्तिकता, श्रद्धा आदि सद्गुण तथा यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत, उपवास, सेवा, पूजा, आदर-सत्कार, सत्यभाषण, ब्रह्मचर्य का पालन, सत्चरित्रता, स्वाध्याय, परोपकार तथा माता-पिता, गुरुजनों की सेवा एवं दुखी, अनाथ-आतुरों की सुश्रुसा आदि सदाचार है। यही हिन्दू संस्कृति है।

वन्दे मातरम--------

भारत माता की जय-----

सोमवार, 14 जून 2010

चोचलेबाज नेता

बिहार के मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार जी ने भाजपा की ओर से लगाये गये पोस्टर जिसमे उनको गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के साथ दिखाया गया था, से नाराज हो गये, ( अपने को धर्मनिरपेक्ष जताने के लिये ) और बयान दे डाला कि " कोसी नदी में आई बाढ़ के वक्त गुजरात से मदद स्वरुप मिला धन सूद सहित वापस कर देंगे।" कितना घिनौना स्वरुप है यह राजनीती का। नितीश जी के इस बयान से उनकी मौकापरस्ती, संकीर्ण मानसिकता का पता चलता है। इस बयान से यह भी पता लगता है कि वे एक जननेता नही बल्कि दलविशेष के दल नेता हैं। कहीं भी किसी भी प्रकार की आपदा आने पर संवेदनशील व्यक्ति अपने सामर्थ्य के अनुसार मदद करता है। कोई भी मदद लेकर बाद में किसी अनबन के कारण ली गयी मदद को सूद सहित वापस करने कि बात नहीं करता, अगर करता है तो ऐसा व्यक्ति संवेदनहीन ही कहलायेगा।

धन्य हैं गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी जिन्होंने गुजरात में आये भूकंप में बिहार से मिली सहायता को सहर्ष स्वीकार किया था और अब बिहार के लोगों को उनके द्वारा दी गयी सहायता का धन्यवाद भी कर रहे हैं। श्री नरेन्द्र मोदी जी जैसे नेता ही जन नेता की श्रेणी में आते हैं।

श्री नितीश कुमार जी से निवेदन है कि वे अपनी कुंठित मानसिकता एवं चोंचलेबाजी का त्याग करें जिससे वे एक सफल जन नेता कहला सकें।

वन्दे मातरम------

भारत माता कि जय------

रविवार, 6 जून 2010

स्वतन्त्रता संग्राम के अमर गीत ( ४ )

"वन्दे मातरम" के दो शब्दों के सहारे देश की आजादी के दीवानों ने तोपों के मुंह और फांसी के फंदों को चूमा और हंसते - हंसते शहीद हो गये। क्रांतिकारियों को इस देश के रचनाकार, लोकगीतकार, कवि और शायरों ने अपने गले का हार बनाया और नित नए-नए गीतों की रचना की। शताब्दियों से पराधीन, अपमानित, और रूढिग्रस्त समाज के ठहरे हुए जल में अपनी रचनाओं के द्वारा ज्वार पैदा किया।

कानपुर के कवि और स्वतन्त्रता सेनानी स्व० श्री श्याम लाल गुप्त 'पार्षद' द्वारा रचित झंडा गीत बहुत प्रचलित हुआ--------

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊँचा रहे हमारा।
सदा शक्ति बरसाने वाला,
प्रेम सुधा सरसाने वाले,
वीरों को हरषाने वाला,
मात-भूमि का तन-मन सारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा॥

क्रांतिकारियों के प्रिय गीत जो वे अक्सर गाया करते थे------------

मेरे शोणित की लाली से, कुछ तो लाल धरा होगी ही,
मेरे वर्तन से परिवर्तित, कुछ परम्परा होगी ही॥
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ऐ मात-भूमि जननी सेवा तेरी करेंगे,
तेरे लिये जियेंगे, तेरे लिये मरेंगे॥
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मेरी जाँ ना रहे मेरा सिर ना रहे, सामाँ ना रहे ना ये साज रहे,
फकत हिंद मेरा आजाद रहे, आजाद रहे, आजाद रहे॥
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माँ, कर विदा आज जाने दे,
जग में तेरा मान बढाने धर्म-कर्म का पाठ पढ़ाने,
वेदी पर बलिदान चढाने, सर में बाँध कफ़न आजादी के दीवाने,
माँ, रण चढ़ लौह चबाने दे,
माँ, कर विदा आज जाने दे॥
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कवि, लिख तो कविता ऐसी लिख,
जिसमें मृदु प्रेम पराग ना हो,
दीपक पतंग कविता तरंग,
कोयल बुलबुल का राग ना हो,
धकधका उठे त्रिभुवन सारा,
ठंडी जिसकी आग ना हो॥

समस्तीपुर जनपद बिहार के निवासी श्री विद्याभूषण मिश्रा 'मयंक' की सन १९४२ की एक रचना का अंश-----

त्रिशूल नीलकंठ से पुनः मांग लो, बढ़ो,
अभीष्ट सिध्द के लिये हिमाद्रि तुंग पर चढो,
ज्वलंत अग्नि पिंड सा प्रचंड वेग लो बढ़ो,
अनिष्ट झेलने अमर्त्य शूरमा बढ़ो-बढ़ो,
चक्रव्यूह भेदने, बढ़ो सृष्टि के महान,
रण भैरवी बजी सुनो उठो, देश के जवान॥

कवि रत्नेश एक भावुक कवि थे परन्तु उनकी भावुकता के पीछे देश की आजादी के लिये आग भरी थी-----

धरती मांग रही बलिदान, बच्चों-बूढों बढ़ो जवान,
सभी संपदा अपनी है, ये धरती अपनी जननी है॥

प्रसाद जी की लेखनी से भी उस समय शब्द रुपी शोले झर रहे थे--------------------

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती,
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला, स्वतन्त्रता पुकारती,
अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ प्रतिज्ञ से चलो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढे चलो, बढे चलो॥



वन्दे मातरम----------------------

भारत माता की जय----------------------

शुक्रवार, 4 जून 2010

स्वतंत्रता संग्राम के अमर गीत ( ३ )

भारत के स्वाधीनता संग्राम में जहाँ आजादी के लिये क्रांतिकारी अपने प्राण हथेली में लेकर अंग्रेजों से लड़ते रहे वहीँ राष्ट्रभक्त रचनाकार ऐसी रचनाओं का सृजन करते रहे जिससे स्वाधीनता संग्राम में चेतना का संचार हो और जनमानस पराधीनता की बेडी तोड़कर फेंकने को तत्पर हो।

मेरे पिछले दो लेखों में आपने कुछ ऐसी ही रचनाओं का अवलोकन किया, प्रस्तुत हैं कुछ अन्य रचनाएं----

गीतकार श्री श्याम सुन्दर शर्मा 'कलानिधि' की रचना के अंश ---------

हम हिन्दू है, हिन्दू - जीवन का,
हमको सतत स्वाभिमान॥
मुगलों से होकर स्वतंत्र हम हुए
पुनः परतंत्र हाय अंग्रेजों के हाँथ,
पर अंग्रेजों को याद हमारी,
सन सत्तावन की कृपाण,
हम हिन्दू हैं----
चित चाह बसंती चोला की,
दे-दे पूर्णाहुति मुक्ति हेतु,
हम खेलें फांसी, गोली से,
फहराने को राष्ट्रीय केतु।
हिल उठी ब्रिटिश इम्फाल भूमि-
तक देख हमारा अधिष्ठान,
हम हिन्दू हैं, हिन्दू जीवन का
हमको सतत स्वाभिमान॥

किसी कवी ने भारत की नारियों के बलिदान को अपने शब्दों से कुछ इस प्रकार संवारा----

हिन्दू-नारियों के बलिदान की कथा पढो,
दुर्ग में चित्तौर के लिखी जो रज-रज में।
चुनी जो चिनाब में, विपत्ति झेल झेलम में,
रावी में रुधिर रख लाज सतलज में॥

कवि शिव दुलारे मिश्र ने सत्य ही कहा है----

स्वतंत्रता की पूजा के हित हमने जीवन-थाल संवारा है,
अगणित वीरों की अमर ज्योति से ज्योतित मार्ग हमारा है॥

कवि माखन लाल चतुर्वेदी की अमर कविता 'पुष्प की अभिलाषा' शरीर को झंकृत कर देती है----

----मुझे तोड़ कर वनमाली ! उस पथ पर देना तुम फेंक,
मात भूमि पर शीश चढाने जिस पथ जावें वीर अनेक॥

स्वतंत्रता के दीवाने कवि शिरोमणि श्री छैल बिहारी मिश्र 'कंटक' जेल यात्रा, स्वाधीनता आन्दोलन के साथ साथ अपने गीतों के द्वारा जनमानस को भी स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ते थे----

देख दासता दूषित दुर्बल, दीन देश का हाहाकार,
सहमे, ह्रदय भी हिल गया, आँखों से निकली अश्रुधार,
धधकी अंतस्तल की ज्वाला, कठिन हो गया पाना त्राण,
सुख से समरांगनमें कूदे, लिये हथेली पर निज प्राण॥

बंकिम चन्द्र चटर्जी का गीत ' वन्दे मातरम ' क्रांतिकारियों के बीच काफी लोकप्रिय था, साथ ही हर आन्दोलन में बड़े जोर शोर से गाया जाता था। 'वन्दे मातरम' गीत की प्रशंसा में एक गीत लिखा गया, गीतकार के नाम से अनजान हूँ परन्तु गीत बहुत लोकप्रिय हुआ----

हम हिन्दुस्तानियों के गले का हार वन्दे मातरम,
छीन सकती है नहीं सरकार वन्दे मातरम्॥
सर चढों के सर में चक्कर उस समय आता जरूर
कान में पहुंची जहां झंकार वन्दे मातरम्॥
मौत के मुंह पर खड़ा हूँ कह रहा जल्लाद से
झोंक दे सीने में अब तलवार वन्दे मातरम्॥
ईद, होली और दशहरा शबरात से भी सौ गुना
है हमारा लाडला त्यौहार वन्दे मातरम्॥
जालिमों का जुल्म भी काफूर सा हो जाएगा
फैसला तो होगा अब सरे दरबार वन्दे मातरम्॥

शेष अगले लेख में----

वन्दे मातरम्-----

भारत माता की जय----

गुरुवार, 27 मई 2010

स्वतंत्रता संग्राम के अमर गीत ( २ )

मेरे पिछले लेख में आपने कुछ कवी और लोकगीतकारों की रचनाओं का संक्षिप्त रूप देखा। आज प्रस्तुत हैं कुछ अन्य रचनाकारों की रचनाएं -----

भारत में अंग्रेजों के दुष्कृत्यों तथा अत्याचारी-तानाशाही पूर्ण शासन से विक्षुब्ध हो कर कलमकारों ने अपनी लेखनी के द्वारा क्रान्ति का उद्घोष किया।

बिहार प्रान्त के शाहाबाद जनपद के डुमराव नामक स्थान में जन्में श्री मनोरंजन प्रसाद सिन्हा ने ' फिरंगिया ' नामक पुस्तक लिखी जो अंग्रेजों द्वारा जब्त कर ली गई। प्रस्तुत है उसी पुस्तक की कुछ पंक्तियाँ ------

सुन्दर सुघर भूमि भारत के रहे रामा,
आज उहे भईल मसान रे फिरंगिया॥
---------------------------
एको जो रोउवां निरदेसिया के कलपति,
तोर नास होई जाई सुन रे फिरंगिया॥
दुखिया के आह तोरे देहिया के भसम करी,
जरि भुनि होई जईबे छार रे फिरंगिया॥
----------------------------
भारत की छाती पर, भारत के बच्चन के,
बहल रक्तवा के धार रे फिरंगिया।
दुधमुहाँ लाल सम, बालक मदन सम,
तड़प-तड़प देले जान रे फिरंगिया॥

तत्कालीन गीतों में गीतकारों ने अपनी शब्द रचना के द्वारा जन चेतना जागृत की। बलिया के श्री प्रसिद्ध नारायण सिंह ने भोज पूरी भाषा में कुछ इस प्रकार लिखा------

अलगा आपन बोली बिचार,
कन-कन में जेकरा क्रांति बीज,
अइसन भोजपुर तप्पा हमार,
इतिहास कहत है पन्ना पसार॥

अंग्रेजों के अमानुषिक अत्याचारों पर श्री प्रसिद्ध नारायण सिंह ने ही लिखा-------

गांवन पर दगलानी गन मसीन,
बेंतन सन मरलन बीन-बीन।
बैठाई डाल पर नीचे से,
जालिम भोकलेन खच-खच संगीन।
बहि चलल खून के तेज धार।।

घर घर से निकलली आहि-आहि,
कोना-कोना से त्राहि-त्राहि,
गांवन-गांवन लूट फूंक,
मारल काटल भागल पराहि,
फिर कवन सुने केकर पुकार॥

बनारस में काशिराज चेत सिंह के साथ अंग्रेज अफसर वारेन हेस्टिंग्स का भीषण संघर्ष हुआ। तब बच्चे-बच्चे की जबान से निम्नलिखित दो पंक्तियाँ गूंजा करतीं थीं जो आज कल भी कहीं कहीं सुनाई पड़ जाती हैं----

घोड़े पर हौदा हाथी पर जीन,
जल्दी में भाग गया वारेन हेस्टीन॥

स्वयं बहादुर शाह जफ़र ने अपनी कलम से लिखा था---

गाजियों में बू रहेगी, जब तलक ईमान की
तख्तें लन्दन तक चलेगी, तेग हिदुस्तान की॥

एक लोक रचनाकार का निम्न छंद बाजुओं को फड़का देता है---

तेगन से मारि-मारि तोपन को छीन लेत,
गोरन को काटि-काटि गीधन को दीन्हा है।
लन्दन अंग्रेज तहां कंपनी की फौज बीच,
मारे तरवारिन के कीच कर दीन्हा है॥

भारत का इतिहास ऐसे सशस्त्र मोर्चों से भरा पड़ा है। जिसमे भारतीय नारियों ने न केवल भाग लिया अपितु कई मोर्चों का सफल नेतृत्व भी किया। इसमें कुछ नाम प्रमुख हैं---- देवी चौधरानी, चुआड़ की रानी शिरोमणि, कित्तूर की वीर रानी चेनम्मा, शिवगंगा की वीरांगना वेलुन्चियार, नेपाल की महारानी लक्ष्मीदेवी और पंजाब की रानी जिन्दा।

किसी कवी ने ऐसी वीरांगनाओं के लिये लिखा है----

रण में जाकर डट गयीं कभी,
अरिदल को मार भगाने को,
चंडी का प्रबल प्रचंड तेज़,
दुनिया को याद दिलाने को।

या झटपट उद्यत हुईं स्वयं ही,
अनल-ज्वाल धधकाने को,
लपटों में जा छिप गयीं कभी,
जो अपना धर्म बचाने को।

इसके कारण ही मान बढ़ा,
जौहर-व्रत की चिंगारी का,
है कितना गौरवशाली पद,
वसुधा में हिन्दू नारी का॥

शेष अगले लेख में----

वन्दे मातरम्-------

भारत माता की जय-------

मंगलवार, 25 मई 2010

स्वतंत्रता संग्राम के अमर गीत ( १ )

भारत की आजादी के लिये हुए स्वतन्त्रता-संग्राम में जहां आजादी की दीवाने क्रांतिकारी देश के लिये अपना सर्वस्व निछावर कर स्वातंत्र-यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे कर अमर हो गये, वहीं, उसी स्वातंत्र-यज्ञ में देश-प्रेमी कलमकारों ने अपनी लेखनी के द्वारा जनमानस को झिंझोड़ा और स्वातंत्र-समर में भाग लेने को प्रेरित किया।

यहाँ उन्ही जाने-अनजाने कवियों, कलमकारों की प्रतिष्ठित और गुमनाम पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं-----

उत्तर प्रदेश के रायबरेली जनपद के कवि स्व० कृष्ण शंकर शुक्ल 'कृष्ण' द्वारा रचित 'वेणी माधव बावनी' का अवधी भाषा का एक छंद अत्यंत प्रेरक था----

तेरी तेग ताव माँहि तडपत जात कृष्ण,
काटि-काटि मुंड झुण्ड दुंद पट कतु हैं।
मच्छिका समान ही उड़ाती है शत्रु शीश,
गौरंग सुअंग को सुआंग सो रंगतु है।
खंग कोपि तोपि देत तोपन को लोथिन सों,
गगन-गगन को तो कछु ना गनतु है।
सिर पै समान असि, सर पै समान अरि,
सर पै नहाय रक्त, सरजा करतु है॥

कवि अजीमुल्ला ने अपनी पुस्तक 'पयामे आजादी' में आजादी प्राप्त करने के लिये नवजवानों को कुछ इस प्रकार ललकारा----

आज शहीदों ने तुमको अहले वतन ललकारा,
तोड़ो गुलामी की जंजीरें बरसाओ अंगारा।
हिन्दू-मुस्लिम-सिख हमारा भाई-भाई प्यारा,
यह है आजादी का झंडा इसे सलाम हमारा॥

वीर सपूता बुंदेलखंड के सूरमाओं ने अंग्रेजों को मरते दम तक बुदेलखंड में प्रवेश नहीं करने दिया। एक अनाम लोकगीतकार ने अपने लोकगीत में कहा----

मचले आजादी के लाने, बुन्देला दीवाने,
मर्दन सिंह बानपुर वारे, नाहर से गुर्राने,
लखतन मर्दन सिंह को, गोरा छिरिया से मिमियाने,
कहत भवानी सुन लो प्यारे, मर्दन मरद कहाने॥

बुंदेलखंड के एक अन्य लोकगीतकार श्री देविदास जी का प्रचिलित लोकगीत----

लोहागढ़ के वीर बाँकुरे, अंग्रेजन को मारें,
भुट्टा से काटें पल-पल में, कोऊ ना आवे द्वारे,
मच गयी खारेन कीच खून की, भागी पलटन गोरी,
देविदास फतह झांसी की हो, यह अर्जी है मोरी॥

श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान जो स्वयं भी एक स्वतंत्रता सेनानी थीं। उनकी प्रसिद्ध कविता 'झांसी की रानी' का एक अंश----

बुंदेले हरबोलों के मुख,
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी,
वह तो झांसी वाली रानी थी॥

प्रो० राजमणि शुक्ल 'विवेक' ने अपनी भोजपुरी भाषा की कविता में लिखा----

अन्धेरि अउर अनियाऊ रहलि अंग्रेजन कर जेठी बेटी,
जनता के समुझि लिहे रहलेनी ओन्हने घर की चेटी॥

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घर-घर चिठिया पहुँचली नेवता कर खून कई अच्छर कागज़ नाहीं,
ठकुरान हथवां हेन्सली तलवारि आजादी कई जोरा उठल मन माँहि,
हाथ उठाइके नीर कहई घुंघटा के तरे रहबी अब नाहीं,
देश के प्रेम कई पीर, घरे बइठी अंगरेज कई मेम सिहाहीं,
कंत के साथ बसंत बिना, खुन्वां कर आज जरी अब होली,
रूप कई अच्छत, ओठ कई अमृत, जै-जै भारत मंत्र कई बोली॥

--------- शेष अगले लेख में----

वन्दे मातरम -----

भारत माता की जय ----------

शनिवार, 22 मई 2010

संस्कृति पर कुठाराघात

भारतीय संस्कृति मानव जीवन की शक्ति है। हमारे राष्ट्रीय आदर्श की गौरवमयी मर्यादा है। मानव-जीवन की स्वतन्त्रता की द्योतक है। हमारे सामाजिक व्यवहारों को निश्चित करती है। भारतीय संस्कृति भारत की प्रेरक शक्ति है।

भारत में कई विदेशी जातियां विभिन्न उद्येश्यों से आयीं और भारत में ही बस गयीं। अंग्रेज भी भारत इसी प्रकार आये थे और भारत में अनेक वर्षों तक राज्य कियाa। अंग्रेजों के शासन से भारतीयों के आचार-विचार, रहन-सहन आदि पर बहुत प्रभाव पड़ा। भारत ने अंग्रेजों से संघर्ष कर के देश तो आजाद करा लिया, परन्तु अपनी संस्कृति में पूरी तरह से नहीं लौट पाए। ब्रिटिश शासन काल में तत्कालीन सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट (भारत मंत्री) लॉर्ड मैकाले ने भारत में रह कर यह आभास किया की भारत वंशियों की संस्कृति को नष्ट किये बिना भारत में शासन करना कठिन है। इस पर उस ब्रिटिश शासनाधिकारी ने गहन विचार कर यह निर्णय लिया की भारत में हम अब ऐसी जाति पैदा करेंगे जिसका रंग और रक्त तो भारतीय होगा परन्तु शिक्षा, रूचि और संस्कृति से वह अंग्रेज होगा। जिसके परिणाम अब भारत में स्पष्ट रूप से दिखलायी पड़रहे हैं।

हमारे कर्म, विचार और आचरण में भारतीयता का अभाव साफ़ दिखता है। हम राजनैतिक रूप से स्वतंत्र हैं पर मानसिक गुलाम हैं। स्वाधीनता शब्द के वास्तविक अर्थ का विचार ना करके केवल स्वाधीनता शब्द की रट लगाना, पीड़ित और क्रीतदास की मनोवृति होने के अलावा और कुछ नहीं।

हिन्दुस्तान की राजनैतिक स्वन्तान्त्रता का तभी कोई सार्थक अर्थ हो सकता है, जब यहाँ भारतीय जीवन के अनुकूल शाशन और शिक्षा व्यवस्था हो। स्वतंत्र भारत के शास्नाधिकारियों का यह कर्तव्य है की हिन्दुस्तानी जीवन के सर्वोन्नती के मार्ग भारतीय संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिये अंग्रेजों ने जो अपनी विदेशी शिक्षा, शिक्षा पद्धति और संस्कृतिके प्रसार द्वारा अपने हित और दूरगामी परिणाम वाले राजनैतिक षड्यंत्र रचे थे उन्हें निर्मूल करें और भारत में भारतीय संस्कृति की रक्षक एवं अनुकूल शिक्षा एवं शाशन व्यवस्था बनाये। स्वतंत्र भारत के शासकों का यह कर्तव्य है की वे इस बात का ध्यान रखें की भारत में रहने वाले हर वर्ग की उन्नति और उनके सांस्कृतिक अधिकार निष्कंटक बने रहें।

व्यक्ति निर्माण ही समाज-निर्माण और समाज-निर्माण ही देश और विश्व के निर्माण का कारक है। व्यक्ति निर्माण श्रेष्ठ संस्कृति के बिना संभव नहीं। किसी भी राष्ट्र का अस्तित्व उसकी संस्कृति से ही स्थायी रह सकता है।

भारत का उत्थान भी भारतीय संस्कृति के पालन से ही संभव है। अपनी संकृति का त्याग मनुष्य, समाज और देश की अवनति का कारक है। बड़ा आश्चर्य होता है की हमारे शासक वर्ग ने अंग्रेजों की बहुत बातें ग्रहण की पर उनसे वे उनके स्व-सभ्यता-प्रचार को नहीं सीख पाए। आज कहने को तोह देश में हिन्दुस्तानियों का शासन है, किन्तु भारतीय संस्कृति के विकास के लिये कोई सुदृढ़ प्रयास होता दिखाई नहीं देता। देश में जब तक भारतीय संस्कृति के अनुरूप भारतीय शिक्षा पद्धति का विकास नहीं किया जाएगा तब तक यह देश 'भारत' होते हुए भी अभारतीय भावों का शिकार बना रहेगा।

हम स्वतंत्र तो हो गये, पर हम, हमारे शासक अपनी भारतीय संस्कृति के अनुपालन में शिथिल हैं। हम अंग्रेजों की भाषा-भूषा-संस्कृति को ज्यादा महत्व देने लगे हैं। किसी भी व्यक्ति के लिये अंग्रेजी भाषा या विश्व की अन्य किसी भाषा का ज्ञान प्राप्त करना और उसमे पारंगत होना बहुत गर्व की बात है। परन्तु अपनी संस्कृति को छोड़ना, उससे दूर हो जाना तो अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मारना है, अपनी पहचान की कब्र खोदना है। ऐसा कर के तो हम अपनी संस्कृति को नष्ट और लुप्त करने के मार्ग पर बढ़ेंगे। हमें और हमारे शासक वर्ग को ध्यान रखना चाहिए कि अगर भारत की संस्कृति नष्ट या मृत हो गयी तो भारत का भी जिन्दा रहना मुश्किल है। विश्व के मानचित्र से भारत का नामोनिशान मिट जाएगा।

इसलिए हमे हर प्रयास करके अपनी संस्कृति को जिन्दा रखना है। तभी हम पूर्ण स्वाधीन और स्वतंत्र हो सकेंगे तथा भारत को विश्व पटल पर सर्वोच्च स्थान दिला सकेंगे।

वन्दे मातरम----------

भारत माता कि जय----------

सोमवार, 17 मई 2010

! ! जय - हिंद ! !

( मित्रों क्षमा चाहता हूँ की मेरा यह लेख काफी बड़ा हो गया है। मैं विवश हूँ। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस पर जब भी लिखा जाता है, शब्दकोष के शब्द तो कम पड़ ही जाते हैं, लेखनी भी और लिखने को मचलती रहती है। )

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की 'विमान दुर्घटना में मृत्यु' की बात सत्य है या असत्य, कुछ पता नहीं। उनका निधन उस दुर्घटना में हुआ या नहीं ? अगर नहीं हुआ तो नेताजी ने अपना बाकी जीवन कहाँ और कैसे बिताया ? वे फिर कभी वापस भारत आये या नहीं ? ऐसे तमाम सार्थक प्रश्नों का उत्तर कब मिलेगा ? इन प्रश्नों के उत्तर की देश और देशवासियों के लिये काफी उपयोगिता है।

पर, अब इससे भी ज्यादा उपयोगी प्रश्न यह है कि हम सुभाष बाबू के विचार, उनका देश के प्रति असीम प्यार, उनकी सोच, उनके आदर्श को जीवित रखें।

उनके विचार-सोच आज भी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सन्दर्भ में उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने उनके जीवनकाल में थे। सरकारी तथा गैर सरकारी दोनों स्तर के कुछ स्वार्थी लोगों ने उनके विचार, उसूल और आदर्शों का सही रूप प्रस्तुत करने के बजाय एक पहेली, एक कहानी, एक मिथक बना कर रख दिया। इन स्वार्थी लोगों ने सुभाष बाबू को कभी भी एक राष्ट्रवादी राजनैतिक, सिद्धांतवादी सामाजिक कार्यकर्ता, भविष्यदृष्टा एवं दार्शनिक के रूप में प्रतिष्ठित नहीं किया। देश की आजादी से लेकर आज तक भारत में बनी सरकारों के इस स्वार्थ और कुटिल शरारत से भरे दोष को जनमानस के सामने उजागर करना समाज के देशभक्त बुद्धिजीवी वर्ग का परम कर्त्तव्य है। जिससे भावी पीढी नेताजी के आदर्शों को अपना कर देश को सही और उचित मार्ग पर ले जाएँ।

नेताजी में नेतृत्व के सभी गुण विद्यमान थे। उनकी उत्कट देशभक्ती, त्याग कि भावना, कार्य निष्पादित करने की लगन और दूरदृष्टि की कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती। नेता जी बहुत भावुक भी थे, भक्ति संगीत सुनकर भाव विभोर हो जाते थे। देश भक्ति का जज्बा, देश पर कुर्बान हो कर इतिहास-पुरुष बनकर पीढ़ियों तक आदर्श बन जाना-- यह खुशनसीबी विरलों को ही मिलती है। हमारे नेताजी ऐसे ही खुशनसीब व्यक्ति थे।

दुसरे विश्वयुद्ध ने विश्व के देशों के आपसी रिश्ते और कई देशों की भौगोलिक सीमायें तक बदल दीं। सुभाष बाबू का कहना था की ऐसे वक्त पर हिन्दुस्तान को आजाद कराया जा सकता है। उनका यह भी दावा था कि भारत कि आजादी के लिये यह आखरी जंग साबित होगी। उनका कहना था की यह आजादी सिर्फ भारत की ही नहीं अपितु पूरी मानवता कि आजादी होगी और बर्तानिया साम्राज्य के ताबूत में आखिरी कील होगी।

भारत के महान क्रांतिकारी गण सुभाष बाबू के आदर्श थे। सुभाष बाबू आजीवन पक्के और वफादार कांग्रेसी रहे। सुभाष बाबू गांधी जी के अहिंसा आन्दोलन के द्वारा भारत को आजादी दिलाने की खोखली नीति पर कभी विश्वास नहीं करते थे। इसी कारण से नेहरु जी की कांग्रेस ने द्वेष वश कभी सुभाष बाबू का साथ नहीं दिया। जिस समय आजाद हिंद फ़ौज की टुकड़ियां मोर्चे पर मोर्चा मारती हुई भारत की धरती की ओर बढ़ती आ रही थीं, उस समय कांग्रेस ने, जिसके हाथ में करोडो हिन्दुस्तानियों कि नब्ज थी जिससे आजाद हिंद फ़ौज को काफी मदद मिल सकती थी, ऐसा कुछ नहीं किया। बल्कि २४ अप्रैल १९४५ को जब भारत आजाद हिंद फ़ौज और सुभाष चन्द्र बोस के प्रयासों से आजादी के कारीब था तब जवाहर लाल नेहरु ने गुवाहाटी की एक जन सभा में कहा " यदि सुभाष चन्द्र बोस ने जापान कि मदद से भारत पर हमला किया तो मैं स्वयं तलवार उठाकर सुभाष से लड़कर रोकने जाऊँगा। " ( वाह ! री कांग्रेसी देशभक्ति )

सुभाष बाबू का सपना था एक आजाद, ताकतवर और समृद्ध भारत। वे भारत को एक अखंड राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे। कांग्रेस देश का विभाजन करके सुभाष बाबू के अखंड आजाद हिंद आन्दोलन की पीठ पर छुरा भोंक दिया। विभाजन का घाव तो एक दो पीढ़ियों के बाद भर जाता, लेकिन दो देश, तीन धर्म पर उसके दुष्प्रभावों ने नफरत की शक्ल में जड़े जमा ली हैं जो कि वक़्त गुजरने के साथ और मजबूत ही हुई हैं। अगर नेता जी कि चेतावनियों पर कांग्रेस समय रहते ध्यान देती और अपने गोरे रहनुमाओं के विभाजन के जाल में ना फंसी होती तो मानवता के माथे पर भयानक रक्त-पात का कलंक लगने से बच जाता।

कांग्रेस का तो बस एक ही राग है गांधी जी ने अपने अहिंसा आन्दोलन के द्वारा भारत को आजादी दिला दी। कांग्रेस की जनसभाओं में गा-गा कर एक ही राग अलापा जाता है--- " दे दी हमें आजादी ----- कर दिया कमाल। " उन सैकड़ों - हजारों शूरवीरों का इतिहास नें कहीं जिक्र ही नहीं जिन्होंने दो-दो आजीवन कारावास भोगे, कोल्हू में बैल कि तरह जोते गये, नंगी पीठों पर कोड़े खाए, वंदेमातरम का उद्घोष करते हुए फांसी का फंदा चूम कर फांसी पर झूल गये। गांधी जी राष्ट्रपिता है, नेहरू जी चाचा है, कांग्रेस की चाटुकारिता में सुभाष बाबू के लिये जगह कहाँ बचती है। गाँधी जी के अहिंसा के बचकाने नारों और नेहरू जी की खोखली नीति एवं भयंकर नादानियों पर अब जनमानस नए सिरे से सोच रहा है और उनके द्वारा की गयी गलतियों से भारत को हुए नुक्सान पर अपना सर धुन रहा है।

युवा वर्ग के लिये नेता जी के विचार काफी दृढ थे। स्वामी विवेकानंद कि तरह वे भी सदैव युवा वर्ग को अपने आन्दोलन से जोड़ते रहे। वे नौजवानों को इतना ताकतवर बनाना चाहते थे कि युवा देश की आजादी के लिये सर्वस्व न्योछावर करने को सहर्ष तैयार रहे। उनका कहना था कि स्वराज की नींव कष्ट और त्याग पर रखी जाती है, जिसपर राष्ट्रनिर्माण होता है। जिसके लिये जरूरी है कि हर परिवार से एक नवजवान भारत माता के चरणों में सर रखने को आगे आये। उनका कहना था कि मेरे कुछ सिद्धांत हैं, उसूल हैं और मैं उनके लिये जान भी दे सकता हूँ। जान बचाने के लिये सिद्धांतो और उसूलों कि तिलांजलि नहीं दे सकता। हमारी लडाई सांसारिक सुख-सुविधा के लिये नहीं है, ना ही हम इस हाड-मांस के शरीर के लिये लड़ रहे हैं। हमारी जंग तो दुष्ट शक्तियों के खिलाफ है। सत्य और स्वतन्त्रता हमारा आदर्श है। रात के बाद दिन आता है, इसी तरह हमारी भी विजय होगी। हम नहीं जानते कि आजादी मिलने तक हम में से कौन जिन्दा रहेगा, पर हमें विश्वास है कि हमें आजादी अवश्य मिलेगी और हमें इसके लिये आत्मविश्वास के साथ अपना कर्तव्य करते रहना चाहिए।

अंत में मैं सिर्फ इतना और लिखना चाहता हूँ कि " कितना भी झूठ गढ़ा जाए, चाहे झूठ का महल खड़ा कर दिया जाए, पर एक दिन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की सच्चाई भारत और भारतवासियों के सामने जाहिर होकर रहेगी, तब आने वाली पीढियां राजनीति के इन ठेकेदारों से, इन चाटुकारों से, इन भडुए इतिहासकारों से सुभाष बाबू के बारे में किये गये अनर्गल प्रलापों का प्रमाण मांगेगी।

तभी यह भारत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का ऋण उतार सकेगा, और तभी यह भारत नेताजी के स्वप्नों का भारत होगा। जय हिंद ! !

वन्दे मातरम-------

भारत माता कि जय----------